Posted by: हेलो | मई 25, 2010

‘गोरबंद’ रो पैलो अंक

राजस्‍थांनी मांय पत्रिकावां री घणी कमी मानीजै। पण जद गुदी मरोड़ निजर न्‍हाखां तो एक सोनळ इतियास चवड़ै हुवै। इण इतियास मांय एक नांव है- गोरबंद।

सन् 1983 सूं सरू हुयी सालाना पत्रिका रो नांव ‘गोरबंद’ राखीज्‍यो। इण सरूवात रो जस है, राजस्‍थांनी रा चावा प्रगतिशील कवि श्री गोरधनसिंह शेखावत नै। श्री शेखावत उण बगत तोदी कॉलेज, लक्ष्‍मणगढ़ (सीकर) मांय कारज करता। वां आपरै साथै सहायक संपादक रै रूप मांय रिछपालसिंह शेखावत नै लियो अर एक ठावी पत्रिका गोरबंद सरू हुयी।

म्‍हारी निजरा मांय ‘गोरबंद’ रो पैलो अंक आयो। इण मांय संपादकीय पेटै गोरधनसिंह शेखावत कैंवता निगै आवै-

”आज जरूरी है के राजस्‍थानी सा‍हित री आपरी पिछाण कायम व्‍है अर साहित रचनाकार रै आसै-पासै री जिंदगी रो जीतो जागतो सबूत बणै। जुलम, सोसण अर अन्‍याय कठै नीं, सगळी जगां है पण फेरूं भी राजस्‍थान रै मिनख रो सुभाव, चरित्र अर उण री मानतावां आपरी ठौड़ न्‍यारी है। —- रचनाकार री घणी-घणी जिम्‍मेवारी है जे उण रै कन्‍नै एक गैरी अर बारीक दीठ हुवै तो।

‘गोरबंद’ रो पैलो अंक है। म्‍हैं चावूं के हरेक रचनाकार आपरी श्रेष्‍ठ रचना इण रै मांय भेजै जिण सूं साल भर री श्रेष्‍ठ रचनावां रो एक जगां संग्रै व्‍है। ओ अंक तो फगत सरूआत है।”

पत्रिका मांय रचनावां रा कुल 61 पाना हा, विज्ञापनां रा न्‍यारा।

इण 61 पाना मांय चंद्रप्रकाश देवळ, भूपसिंह भूपेन्‍द्र, पुरसोतम छंगाणी, विस्‍णुदत्‍त जोसी, रामधारी इमरोज री कवितावां, गोपाल जैन रो ‘राजस्‍थानी लेखन : एक विचार’, सुमेरसिंघ सेखावत ‘राजस्‍थानी बिना राजस्‍थान रो कांई अर्थ’ लेख, कुंदनसिंघ सजल री गजल, तेजसिंघ जोधा सूं गोरधनसिंघ री बातचीत, कल्‍याणसिंघ राजावत, रिछपालसिंघ सेखावत, प्रेमजी प्रेम रा गीत अर कीं दूजा व्‍यंग, कहाणी, कुण्‍डलिया, रंगरेख, उल्‍थो अर पोथी चरचा भेळी ही।

उमाचरण महमिया ‘ले‍ लियो ना लाडू’, बी.एल. माली ‘मिलणो गधा नै एक वरदान रो’, क्रस्‍न गोपाल सरमा ‘धोबो’ नावं रो व्‍यंग्‍य इण अंक भेळो करवायो।

मनोहरसिंघ राठौड़ ‘रोसनी रा जीव’, चेतन स्‍वामी ‘कुरीत’, राघव प्रकाश ‘खून कुण कोा हुयो’ अर भगवान किराड़ू नवीन ‘आड काठणी’ कहाणी मांडी।

अंक मांय गिरधारीसिंघ सेखावत रा ‘काका कमजोर री कुण्‍डलिया’ अर ओंकारश्री रो रंगरेख ‘पांची मनमीठी’ भेळो हो। महमूद दरवेश री तीन कवितावां रो उल्‍थो कवि नंद भारद्वाज करयो।

‘गोरबंद’ रै इण अंक मांय पोथी-चरचा पेटै गोपाल जैन री पोथी ‘काल चेतना’, डॉ. उदयवीर शर्मा री पोथी ‘सूंटो’, सुमेरसिंघ सेखावत री पोथी ‘मरू-मंगल’ अर नंद भारद्वाज री पोथी ‘दौर अर दायरौ’ री चरचा ही।

इण रचनावां अर मंडाण मांण कैयो जावै कै ओ समकालीन पत्रिकावां मांय नुंवै चिंतण अर नुंवै अध्‍याय रो पसवाड़ो हो। गोरधनसिंह शेखावत री आलोचकीय दीठ अर कवि मन दोवूं पत्रिका रै साथे हा, वठै ई एक लाम्‍बो-चवड़ो संरक्षक मण्‍डल।

इण अंक मांय खास रूप सूं गोरधनसिंह शेखावत जकी तेजसिंह जोधा सूं बंतळ करी है वा घणी महताऊ है।

राजस्‍थांनी री गत सूं सोचां तो आ एक बहोत आच्‍छी सरूवात ही।

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