Posted by: हेलो | मई 15, 2010

राजस्‍थांनी बाबत

साहित्य-कर्म मेरे लिए जीने का तरीका है : नंद भारद्वाज

—– यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए मेरा मन अपनी मातृभाषा राजस्थानी में अधिक रमता है। यद्यपि अभिव्यक्ति के बतौर हिन्दी और राजस्थानी दोनों मेरे लिए उतनी ही सहज और आत्मीय हैं और दोनों में समानान्तर रचनाकर्म जारी रखते हुए मुझे कभी कोई दुविधा नहीं होती।

अपने साहित्य-कर्म को लेकर जब भी सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान का कोई अवसर आता है और वहां अपनी भाषा को लेकर कोई रियायत या अतिरिक्त दया-भाव देखने में आता है, तो मेरा मन उद्वेलित हो उठता है। मुझ जैसे सैकड़ों राजस्थानी लेखक और करोड़ों मूक लोग आजादी के बाद से अब तक इस भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत हैं। मैं बिना किसी भावावेश के अपने मन की यह पीड़ा दोहराना चाहता हूं कि हमारा यह मान-सम्मान तब तक अधूरा है, जब तक इस भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल जाती।

जिस भाषा में सात सौ वर्षों की समृद्ध साहित्य-परम्परा मौजूद हो, कविता, कथा, उपन्यास, नाटक, आलोचना और गद्य की तमाम विधाओं में पर्याप्त सृजन उपलब्ध हो, हजारों हस्तलिखित पाण्डुलिपियां और प्रकाशित पुस्तकें शोध-संस्थानों और पुस्तकालयों में अंटी पड़ी हों, लोक-कथाओं, लोक-नाट्यों, लोकगीतों और मुहावरों-लोकोक्तियों का अकूत भंडार बिखरा पड़ा हो, जो आजादी से पहले राजपुताना की रियासतों की राजभाषा रही हो, षिक्षा, कारोबार और आम बोलचाल का आधार रही हो, ढाई लाख शब्दों की नौ जिल्दों में फैला जिसका विशाल शब्दकोष अजूबे की तरह सजा हो, जिसका अपना अलग व्याकरण मौजूद हो, उस करोड़ों लोगों की सजीव और समर्थ भाषा को उसका उचित स्थान न मिले, तो उस पीड़ा को वही जान सकता है, जिसे इस वास्तविकता का अहसास हो।

पिछले चार दशकों में अपने साहित्य-कर्म के साथ मैं मीडिया में भी सक्रिय रहा हूं। इधर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार को कुछ लोग कला-साहित्य के लिए एक खतरे की तरह देखने लगे हैं, जबकि देखना उसे एक सकारात्मक चुनौती की तरह ही चाहिये। इस व्यावसायिक मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं। अपनी साख और बौद्धिक वर्ग में घुसपैठ के लिए वह साहित्य या कला-रूपों का मनमाना इस्तेमाल बेशक कर लेता हो, लेकिन साहित्य और कला से उसका रिश्ता कतई विश्वसनीय नहीं बन पाया है। यहां तक कि लोक-प्रसारण का दावा रखने वाली माध्यम इकाइयां भी अपने प्रयत्न के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं अर्जित कर पाई हैं।

व्यावसायिक मीडिया को हम जितनी आसानी से जनसंचार की संज्ञा से विभूषित करने लगते हैं, दरअसल वह उसके मूल मकसद के कहीं आस-पास भी नहीं होता। उस जन की भागीदारी वहां नगण्य है, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।

लोग अक्सर इस तथ्य को गौण कर जाते हैं कि लोक-भाषा जन-अभिव्यक्ति का आधार होती है। प्रत्येक जन-समुदाय अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में जो भाषा विकसित करता है और वह उसके सर्जनात्मक विकास की सारी संभावनाएं खोलती है। उसकी उपेक्षा करके कोई माध्यम जनता के साथ सार्थक संवाद कायम नहीं कर सकता।

उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाव अनायास ही बाजार में प्रवेश कर गये हैं। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब सारा मार्केट और सारे उपभोक्ता उन्हीं के इशारों पर चलेंगे, लेकिन सचाई इतनी सीधी और सरल नहीं है। यह व्यावसायीकरण भी जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पांव नहीं टिका पाता। इन कंपनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुंचाना होता है, तो वे हिन्दी या कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओं की सामान्य बोलियों तक जा पहुंचती हैं। यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओं को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है। साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाये रखना है। यहीं एक लोक-कल्याणकारी राज्य की सार्थक भूमिका का सवाल भी सामने आता है। लोकतंत्र में लोक और तंत्र एक-दूसरे के पूरक होकर ही जिन्दा रह सकते हैं, अन्यथा न लोक चैन से जी पाएगा और न तंत्र ही साबुत रह पाएगा। दरअसल भाषा, साहित्य और संवाद के यही वे उलझे सूत्र हैं, जिन्हें सुलझाकर ही शायद हम किसी नये सार्थक सृजन की कल्पना कर पाएं।

(‘हथाई’ से)

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नंद भारद्वाज : एक परिचय


राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर के माडपुरा गांव में 1 अगस्त, 1948 को जन्म। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से सन् 1971 में हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद जोधपुर विश्वविद्यालय से मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया पर शोध-कार्य। हिन्दी और राजस्थानी में कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी के रूप में सुपरिचित। सन् 1969 से कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संवाद और अनुवाद आदि विधाओं में निरन्तर लेखन और प्रकाशन। जन संचार माध्यमों विशेषत आकाशवाणी और दूरदर्शन में कार्यक्रम नियोजन, निर्माण और पर्यवेक्षण में सैंतीस वर्षों  का कार्य अनुभव।

प्रकाशन :

राजस्थानी में –

  • अंधार पख (कविता संग्रह) ,
  • दौर अर दायरौ (आलोचना),
  • सांम्ही खुलतौ मारग (उपन्यास),
  • बदळती सरगम (कहाणी संग्रह)।

हिन्दी में –

  • झील पर हावी रात (कविता संग्रह),
  • संवाद निरन्तर (साक्षात्कारों का संग्रह),
  • साहित्य परम्परा और नया रचनाकर्म (हिन्दी आलोचना),
  • हरी दूब का सपना (कविता संग्रह),
  • संस्कृति जनसंचार और बाजार (मीडिया पर केन्द्रित निबंधों का संग्रह),
  • कवि लच्छीराम तावणिया कृत करण-कथा का पाठ-संपादन एवं विवेचन (शोध),
  • आगे खुलता रास्ता  (अनुदित हिन्दी उपन्यास) ।

सम्पादन :

  • सन् 1971-72 में जोधपुर से प्रकाशित दैनिक ´जलते दीप´ का संपादन,
  • सन् 1972 से 1975 तक राजस्थानी  साहित्यिक पत्रिका ´हरावळ´ का संपादन,
  • सन् 1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित ´राजस्थान के कवि´ शृंखला के तीसरे भाग “रेत पर नंगे पांव का संपादन,
  • 1987 में राजस्थान शिक्षा विभाग द्वारा प्रकाशित सृजनधर्मी शिक्षकों की राजस्थानी रचनाओं के संकलन ‘सिरजण री सौरम’ का संपादन,
  • 2007 में नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नई दिल्ली से स्वतंत्रता के बाद की राजस्थानी कहानियों के संकलन “तीन बीसी पार का संपादन ।

सम्मान :

  • राजस्थानी ग्रेजुएट्स नेशनल सर्विस एसोसिएशन, मुंबई द्वारा ´अंधार पख´ पर वर्ष की श्रेष्ठ कृति का पुरस्कार सन् 1975 में,
  • राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा ´दौर अर दायरौ´ के लिए नरोत्तमदास स्वामी गद्य पुरस्कार सन् 1984 में,
  • द्वारिका सेवा निधि ट्रस्ट, जयपुर द्वारा राजस्थानी साहित्य की विशिष्ट सेवा के लिए पं ब्रजमोहन जोशी गद्य पुरस्कार सन् 1995 में,
  • मारवाड़ी सम्मेलन, मुंबई द्वारा ´सांम्ही खुलतौ मारग´ पर घनश्यामदास सराफ साहित्य पुरस्कार योजना के अन्तर्गत ´सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार 2002 में,
  • दूरदर्शन महानिदेशालय द्वारा भारतीय भाषाओं की कालजयी कथाओं पर आधारित कार्यक्रम शृंखला के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान के लिए विशिष्ट सेवा पुरस्कार, सन् 2003 में,
  • साहित्‍य अकादेमी, नई दिल्‍ली द्वारा  ‘सांम्ही खुलतौ मारग’ पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2004,
  • संबोधन संस्थान, कांकरोली द्वारा वर्ष 2005 में ‘हरी दूब का सपना’ पर आचार्य निरंजननाथ साहित्य पुरस्कार,
  • एमिटी वि.वि. जयपुर परिसर द्वारा मीडिया एण्ड कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए `एमिटी लीडरशिप अवार्ड´ सन् 2005 में,
  • के.के. बिड़ला फाउंडेशन का `बिहारी पुरस्कार-2008´ काव्य-कृति `हरी दूब का सपना´ पर ।

सम्प्रति  : दूरदर्शन केन्द्र जयपुर के वरिष्ठ निदेशक पद से सेवा-निवृत्त। लेखन।

स्थाई पता : 71/247, मध्यम मार्ग, मानसरोवर , जयपुर-302 020

दूरभाष : 0141-2782328, मो. 98291 03455

ब्‍लॉग – http://hathai.wordpress.com/

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