Posted by: हेलो | मई 13, 2010

साहित्य रै सांम्ही चुनौतियां

साहित्य रै सांम्ही आजकालै री चुनौतियां
नुंवां विमर्शां रै औळै-दोळै

समकालीन साहित्य री चर्चा करां अर उणरै संकटां रो जिकर करां तो सैंग सूं पैली साहित्य अर साहित्यकार बाबत ई सोचीजै। आज साहित्य री रुचि समाज मांय घटती दिखै। साहित्य री मांग फगत लाइब्रेरियां ताणी रैंवती-सी लखावै। बठै ही पाठकां रो टोटो-सो लागै।
दूजी कानीं देखां तो साहित्यकारां री निजूं समस्यावां मूंडागै आवै। आपरो जीवण होम अलेखूं पोथ्यां रच`र इज साहित्यकार भूखो मरै। दो पीसा जे इन्नै-बिन्नैं सूं आवै तो बै ई साहित्य पेटै खरच कर`र परिवार रो बो दुसमण बणै। प्रकाशन री समस्या सूं बो दो-दो हाथ होवै। साम्ही दियां ही कोयी छापै कोनी! अर जे कोई छाप ही देवै तो च्यार आनां दिखावै कोनी।
साहित्य अर पाठक। साहित्यकार अर प्रकाशक। प्रकाशन अर बिक्री।
आं बातां सूं अळगी जकी सैं सूं मोटी समकालीन साहित्य मांय चरचा है तो बा है विसय रै चुनाव री। साहित्य सदीव पुराणी परिपाटी सूं न्यारो हट`र ऊभो होवण रा ताफड़ा तोड़ै। आज ई विचारां रा न्यारा-न्यारा चितराम मंडै अर वै विमर्शां रै नाम सूं पीछाणीजै। लेखन मांय समकालीन दौर हरमेस प्रयोगां रो दौर मानीजै। कैयी लिखारा आं मतां नै मानै तो कैयी मानै कोनी।
पण कीं हुवो भलांईं….. लिखारो जुगु सांच प्रकटै। लिखारो जको लिखै बीं नै पैलां बो महसूस करै। फगत दिमाग सूं ई नीं; दिल सूं ई। चावा समीक्षक ई आ कैवै कै चायै कोयी हामळ भरो अर चायै ना भरो; लिखारै रो घणकरो`क लेखन देखेड़ो अर भोगेड़ो सांच होवै।
कठै-कठै ही कलाधरां नै छोडां तो आ साव सांच है कै लिखारो कीं देखै, सुणै-भोगै अर मांयलो कीं मैसूस करै, बा बात उण रै हियै ढूकै तद ही कोयी सबद-निसरणी चढ़ै। आ लिखारै री करामात हुवै कै फगत घटना नै बो किण भांत साहित्यिक विधा मांय ढाळै। मूल कथावस्तु रै साथै के जोड़ै अर के घटावै। कलात्मकता दिखावै कै सीधी सरल भासा मांय प्रकटै। गद्य मांय अंवेरै कै पद्य मांय।
आपां जका लिखारां नै निजू जाणां बां री रचनावां मांय ओ सांच पड़तख हुंवतो लागै। एकाधी रचनावां अपवाद हुय सकै। पण समचो लेखन इण ताकड़ी पर तुलै तद ओ तौल लगैटगै खरो उतरै। रैयी आदू लेखन अर समकालीन लेखन री बात? तो दोनू पखां मांय परिवेस रो अळगाव ही रचनात्मक आंदोलन खड़्यां कर्या।
समकालीन दौर मांय लेखन री चर्चा करां तद विषय रो सवाल लाजमी हुवै। बखत अर विषय दोनूं महताऊ पख है। दोनूं साथै-साथै चालै। बखत बदळै तद बीं रो विषय ही बदळै।
आजादी आयी; आमजन रै सुपनां सांच होवण रो बखत आयो। खुशियां मनायीजी अर मंगळ गाइज्या। बखत बदळ्यो। लिखारां बदळतै बगत सारू चेताया …..। सुपना सांच होवण रो भ्रम पाळ्यां बैठ्यां मिनख-मानवी उण भ्रम रै भटकाव सूं बारै निकळण सारू ताफड़ा तोड़ण लाग्या। तद ओ लाजमी हो कै लिखारां रा सुर बीं तड़फ माथै केन्द्रित हुया।
समाज री मान्यतावां अर परम्परावां मांय परिवेश हमलो कर्यो तद लिखारां रो विषय बदळ्यो। पाश्चात्य रै मोह मांय के हुय सकै रचनाकारां हेलो कर्यो अर सांच नै उघाड़्यो।
राजशाही, पुरुषशाही, अर्थशाही रै बखत जका पीड़ित, दलित अर दमित हां बां रो हेलो पाट्यो अर बां री आवाज साहित्यिक जगत मांय आयी। अठै सूं विमर्श सरू हुया अर अै विमर्श चरचा रो विसय बण्यां।
कैयी लिखारां आं विमर्शां नै अंगेज्या तो कैयी लिखारां सिरै सूं खारिज कर्या। जिस्यो आप-आपरो सोच, बिस्या विच्यार। जका प्रभावी वर्ग रा प्रतिनिधि हा बै दलित, दमित री औकात किंयां सैण करता ? अर साव तो आ है कै आज ही किंयां सैण करै… ?
आं विमर्शां मांय नारी विमर्श अर दलित विमर्श खास है, जकां नै म्हैं निजू तौर सूं अंगेजूं अर बात इण पैटै ई राखूं।

आज समकालीन साहित्य री दरकार रो सवाल ऊभो हुवै तो सैंग सूं पैलां एक बात तै करल्या कै साहित्य रा पाठक कुण …? आ आपां सगळां जाणां कै साहित्य रै पाठकां मांय बहुमत सबळ अर आपरो डोळ सुधार्योड़ा, शिक्षा सूं जुड़ाव राखणिया मिनखां रो है। आं नै आपां साहित्य रा पाठक मानां।
तो आ बात तो तै हुग्यी कै साहित्य रा पाठक कुण ….?
पछै लिखारां साम्हीं दूजो सुवाल ओ खड़्यो हुवै कै ईं वर्ग सारू साहित्य रचीजै, कै इण वर्ग सूं कटेड़ो जको हांशियै पर वर्ग खड़्यो है बीं सारू। म्हारो ओ मानणो है कै इण दोगाचिंतीं मांय घणकरा`क लिखारां हांशियै पर खड़्यै वर्ग नै नकारता गया अर वाहवाही लूटण सारू जागरूक वर्ग सारू लिखता रैया।
इण खातर कै वाहवाही दै कुण ? म्हारै सारू बडायी लिखीजसी तद वाहवाही म्हैं ही देस्यूं। थारी बडायी लिखीजसी तद वाहवाही थे ही देस्यो। अठै जाय`र साहित्य रो भटकाव मानीज सकै, अर इण भटकाव रै कारण इज साहित्य मांय विमर्श जाम्या।
आ तै मानो कै पुरख रो मांयलो कठै नैं कठै ईं बात नै जरूर मानै कै नारी बापड़ी आज सावळ कूकै ….? बो सोचै कै आपां बीं नै कित्ती आजादी दी ….? बीं नै किण भांत राखी …..? बीं नै के सुविधावां दी ……? काम रो बंटवारो किंयां कर्यो …..? फगत पुरखवादी सत्ता नै बंचावण खातर के-के उपोम कर्या?
नारी नै सदीव ‘देवी` बणायां राखी। कदै ई मिनख नीं मानी। मिनख नै जिण जरुरतां री दरकार हुवै बां सूं वंचित राखण मांय कमी कोनी छोडी!
देवी इण खातर बणायां राखी कै आ जरूरी ही। पुरख नै नारी बिनां काम कोनी चालतो दिख्यो। अर कीं नै पोमावण खातर कीं-न-कीं तो झुझणियो थमावणो ई पड़ै। देवी रै मोह मांय अर पुरखां री बडायी बिचाळै बापड़ी नारी पिसीजती रैयी। आज शिक्षा रो प्रचार हुयो। आपरा हकां नै पिछांण करण री खिमता नारी मांय आयी अर हकां री मांग उठण लागी तो पुरख चरित्र रूपी इस्यो लांपो लगा`र समाज नै चेतायो कै देखो आ तो भौत माड़ी हो`री है! नारी जे आगै बढ़गी तो बा आपणी कद मानसी अर आपणी यौन दासता री बेड़ी रो के होसी? तद इण रो एक ही इलाज है कै इण रै चरित्र रै लांपो लगावो अर समाज साम्ही आ नजीर पेस करो कै देखो आगै बढ़ायां आ हुवै!
म्हारो ओ मानणो है कै सफल पुरखां अर सफल नारियां रै चरित्रां री तुलनां करां तो कठै ही पुरख लारै कोनी। पुरख कमती गिरेड़ां कोनी? आपरै गिरबान मांय झांकै तद सै उघाड़ा दिखै। पण आपणी सत्ता खातर आपां तरळा लेवां अर बीं नै आपां दरकिनार करां तो आ साहित्य सागै ज्यादती है।
चित्रा मुद्गल, मदृला गर्ग, ममता कालिया, मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, मृणाल पांडे, रमणिका गुप्ता, निर्मला भुराड़िया, कमला चमोला, नमिता सिंह, अलका सरावगी, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा, कुसुम मेघवाळ आद आज जे ऊभी होय`र नारी पात्रां रो सांचलो चितराम प्रकटै तो फगत आपां के नारी विमर्श रै नांव सूं नकार सकां….? नीं कदै ही कोनी नकार सकां ……..।
इंयां ही दलित री बात।
बरसां सूं देखतो आइज्यो है अर आज इज देखीज रैयो है कै दलित बो जको आपरै अधिकारां नै जाणै कोनी, साधन-सम्पन्न कोनी, अर जकै री अक्ल री गोझ खाली-सी है ……..। आज रै आर्थिक जुग मांय दलित बो, जको पिस्सावाळो कोनी ?
जातीय व्यवस्था री बात करां तो दलित वर्ग जुगां सूं दमित रैयो है। उणरी कारू कौम रै रूप मांय पिछांण रैयी अर उण हाडतोड़ मिणत कर`र मिरच रोटी खावणो आपरी नियति मानी। आज ही बा बात है। राजस्थान री बात करां अर खासकर गांवां री तो आ साव उघड़ै कै दलित बिच्यारा आज ही शोषित है। फर्क आयो है तो इत्तो ही कै बस उणां रा शोषक बदळ्ग्या।
हाड तोड़ मिणत रै बदळै मांय पेट भरण जोग दाणां उणां नै कदै ही कोनी मिल्या। शोषक वर्ग पूरो पेट भरण जोग दाणां उण नै कदै ही कोनी दिया, क्यों`क शोषक जाणै कै जे शोषित धापग्यो तो बीं रो चिंतण उडार मारसी अर बो आपरै हकां नै पिछाणसी। जे बो आधो भूखो रैयो तो फगत उण रो सोच बाकी आधी रोटी रै ओळै-दोळै ही रैयसी। आ साव सांच है।
शरण कुमार लिंबाले, जयप्रकाश कर्दम, ओमप्रकाश वाल्मिकी, रत्नकुमार सांभरिया, प्रहलादचंद्रदास, अजय नावरिया, मोहनदास नैमिसराय आद चावा लिखारा आज आपरो भोगेड़ो सांच प्रकटै तो के दलित विमर्श रै नांव सूं बो खारिज करीज्या ? म्हारै मत्तै तो कोनी। क्यूं कै आ जुगु सांच है कै शोषित जद दायरै सूं निकळसी तो बो आपरी बात ठरकै सूं कैयसी।
समकालीन साहित्य मांय अै बात चरचा जोग है अर आं माथै मोटी चरचा होवणी चाहिजै।
आज जद आपां सफल राष्टघ् री कल्पना करां तो समाज रै सगळां वर्गों रो उठाव जरूरी मानां। आपां कलमकार हां अर कलम सूं कीं उकेरण री खिमता राखण री हूंस पाळ्यां बैठ्या हां। तो क्यूं`न कीं नै कीं इस्यो लिखां जको आपणै असवाड़ै-पसवाड़ै रै माहौल मांय चिरमिराट लगावै अर उण माहौल मांय रसणिया-बसणियां नै सोचण सारू मजबूर करै कै आपां के कर रैयां हां? आपां ही तो कठै दमनकारी नीं हां? आपां ही तो कठै मिनख-मिनख मांय दुभांत नीं कर रैया हां? आपां ही कठै आपणी अस्मिता बचावण खातर मूल मुद्दां सूं नीं भटक रैयां हां।
म्हारो तो ओ मानणो है कै विषय रो चुनाव ही रचना रो उठाव हुवै। जे विषय चुभतो चुनीजग्यो तो रचना जगचावी होंवता बार कोनी लगावै।
अर आ तै मानो कै किस्यै ई दौर मांय विषय रो चुनाव जे सटीक होग्यो तो बो जगचावो होंवतो बार कोनी लगायी। प्रेमचंद आज क्यूं सैंग सूं बेसी पढ़ीजै? चेखव, गोर्की क्यूं देस-काल री सींव सूं बारै आया? कारण ओ कै विषय रो चुनाव सटीक अर रचनाधर्मिता काळ्ज्यै सूं निभाइजेड़ी। पाठक रचना रै नैड़ै आवै तो बिंनैं कठै ई रचना मांय बनावटीपण कोनी लागै अर उण नै लागै कै अरै आ रचना तो म्हारलै गांव री है, म्हारली ढाणी री है, म्हारलै कस्बै-नगर री है। आ रचना तो म्हारै माथै लिखीजी है, बा रचना म्हारलै उण भायलै माथै है, तीजी रचना म्हारलै गांव रै फलाणै री है। ओ तादात्म्य ही रचना रो अमरपणो है। चंद्रसिंह बिरकाळी री ‘बादळी` क्यूं जगचावी बणी? अन्नाराम सुदामा क्यूं राजस्थानी रा चा`वा गद्यकार बण्ग्या? फगत ओ इज कारण रैयो। कोरा आदर्श रचनावां मांय कोनी जाम्या अर सांच पड़तख हुयो।
रचना जद पाठकां रै काळ्जै छावै तो उण लिखारै साम्ही न तो प्रकाशकां री कमी रैयसी अर न पाठकां री। अेक-अेक रचनां री हजारू पड़तां बिकतां बार कोनी लागै! आ आपां सुणां ही हां अर देखां ही हां। पछै क्यूं नी सांच नै अंगेजा अर आगै बढ़ां। जुग बदळ्ग्यो है अर जुग मांय विषय बदळ्ग्या हैं। आपां नै छेकड़ दलित अर नारी भावना नै पिछाणणी पड़सी… अर लिखणो पड़सी….. ।
आपां पढेसरी ई हां, आपां आ कैय सकां कै विमर्श आज? विमर्श तो जुगु सांच है। प्रेमचंद री रचना ‘घासवाली` री मुलिया, ‘ठाकुर रा कुआं` री गंगी, ‘दूध का दाम` री भूंगी भंगन, ‘कफन` री बुधिया, ‘गोदान` री सिलिया, ‘मंदिर` री सुखिया आद पात्र के इण विमर्शां माथै खरा नीं उतरै? जयशंकर प्रसाद, रांगेय राघव रा ई घणकरा पात्र बठै दिखै।
मन्नू भंडारी री ‘यह भी सच है` री दीपा, कृष्णा सोबती रै ‘मित्रो मरजानी` री सुमित्रावंती, मृदला गर्ग री ‘तीन किलो की छोकरी`, कमला चमोला री ‘उसके हिस्से की जीत` री श्रीमती वेद, नमितासिंह री ‘दर्द री रमिया`, प्रभा खेतान री ‘छिन्नमस्ता` री प्रिया आद पात्र जठै नारी विमर्श तो बठै ही ओमप्रकाश वाल्मीकि री ‘चिड़ीमार` रो सुनीति, प्रहलादचंद्रदास री ‘अब का समय` री अंजू, अजय नावरिया री ‘उपमहाद्वीप` रा वह, जयप्रकाश कर्दम री ‘लाठी` री अंतरो आद पात्र दलित विमर्श माथै के बेसी खरा उतरै? तो आपां नै कैवणो पड़सी कै नां। दोनुवां मांय समानता है, अर बात अेक बळ री उतरै। पण आपां देखां कै झीणै रूप मांय नुंवां रचनाकारां री शैली अर शिल्प कथा नै समकालीन बणावै जियां स्वामी रामदेव महाराज आजकालै प्राचीन योग पद्धति नै समकालीन बणाय राखी है।
इण विमर्शां पेटै म्हारो मत्तो तो ओ है कै अै विमर्श आदू सांच है। जुग री मांग है। आं नै आपां नकार कोनी सकां। हां आ सोचा-विच्यारी हो सकै कै आं रै नाम माथै बाड़ाबंदी आपां नै करणी चाहिजै कै नीं।
विमर्श कदै ही समकालीन साहित्य रो पतन कोनी कर्या करै वै विकास मार्ग रा सहायक ही हुवै। विमर्श जुगु सांच रो ई एक नांव है। इण खातर आपां नै समकालीन साहित्य मांय विमर्शां नै चुनौती रै रूप मांय नीं लेवणां चाहिजै अर आं नै आगै बढ़ा`र हांसियै माथै जींवतै वर्ग री भावनां उकेरणी चाहिजै। झुकतै रा तो सै सीरी हुवै। सतपुरख तो बो बजै जको उडतै रो ही पख लेवै अर उण रो सांच प्रकटै।
जागरुक बण`र देखां तो वर्तमान मांय साहित्य साम्ही चुनौती है पाठक री रुचि अर उणं रै मनभावंतो लिखण री। बखत सारू पाठक बदळै, उण रो सुभाव बदळै अर उण रो नजरियो बदळै। बात चायै सागी बा ई हुवो जकी आदू चालती आयी है पण लिखण रो ढंग आज रै पाठक साम्हीं आज रै सोच रो अर आज रै ढंग रो होवणो चाहिजै।
लिखारां नै ही विमर्शां अर आदर्शां रो मेळ कर`र चोखो लिखतां थकां प्रकाशकां नै मतोमत्त बुलावणां है अर खूब बिक`र चावा पाठकां ताणी पूगणो है। आ बात घणी दो`री कोनी। बदळाव सूं ई सो-कीं संभव होसी, चायै सरूवात आज करो अर चायै का`ल।
ओ बदळाव हुयां पछै वर्तमान साहित्य रै समक्ष चुनौतियां रै रूप मांय आपां प्रकाशन, बिक्री, पाठक आद जेड़ी जकी बातां मानां बै मतोमत्त खतम होंवती दीखसी। पाठकां री रुचि ख्यांत राखतां थकां आमजन री बात उठावणी पाधरो पांवडो दिखै।

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