ओळखांण

कामां रै ओळै-दोळै – साहित्‍यकार रावत सारस्‍वत : एक ओळखांण

चूरू री धोरां-धरती अलेखूं नखतर्यां री जलम भौम है। अठै रा लाडेसर आपरै तेज अर हेज सूं हरमेस आखी भौम रा मनभावणा-मनचावणा रैया है। राजस्थान ई नीं, राजस्थान सूं बारै-ई अठै रै मानखै आपरी हाजरी मंडायी है। देस-दिसावर रा जूझारू ब्यौपारी अर फौजां रा बांकीला रंगरूटां तो इण धरती नै खासी बडम दीरायी-ई दीरायी है, पण अठै रा कलमधणी लिखारा ई आपरी न्यारी-निकेवळी पिछांण करायी है।
भरत व्यास, मेघराज मुकुल, कन्हैयालाल सेठिया, रावत सारस्वत आद इण सईकै रै खास लिखारां रा नांव है, जकां साहित्य-आभै मांय नुंवै अंदाज सूं थरपीज्या। जूनी बातां करां तो घणां ई लिखारा रा नांव चेतै आय सकै, जकां रै पांण इण छेतर रो नांव गरबीजै, पण आपां नै बात रावत सारस्वत सूं सरू करणी है, इण कारणै आपां चेतै करां १९२१ ई. री २२ जनवरी नै। इणी दिन चूरू रै कुर्विलाव सारस्वतां रै घरां नखतरी रावत सारस्वत रो जलम हुयो। पिता रो नांव हनुमानप्रसाद सारस्वत अर मां रो नांव श्रीमती बनारसी देवी।

रावत सारस्वत री सरूवाती पढाई चूरू मांय ई हुयी। वै पढण मांय घणा हुंसियार हा। आठवीं ताणी बोर्ड मांय पैली ठौड़ लेय`र छात्रवृत्ति रा हकदार बण्या। सन् १९३९ मांय बीकानेर बोर्ड सूं हाईस्कूल परीक्षा पास करी अर इण परीक्षा मांय बीकानेर स्टेट मांय प्रथम स्थान हासळ कर्यो। सन् १९४१ मांय आगरा विश्वविद्यालय, आगरा सूं प्रथम श्रेणी सूं बीए री डिग्री लीन्ही। सन् १९४७ मांय नागपुर विश्वविद्यालय सूं प्रथम श्रेणी मांय एमए अर सन् १९४९ मांय राजस्थान विश्वविद्यालय सूं प्रथम श्रेणी मांय एलएल.बी. री डिग्री लीन्ही।

रावत सारस्वत सन् १९४१ सूं १९४४ ताणी अनूप संस्कृत लाईब्रेरी, बीकानेर मांय पुराणा संस्कृत, डिंगळ-पिंगळ अर प्राकृत रा ग्रंथां माथै सहायक लाइब्रेरियन रै हैसियत सूं काम कर्यो। आं वां री साधना स्थळी बणी अर अठै जको कीं सीख्यो वो रावतजी रै आखी उम्र काम आयो।
सन् १९४५ सूं १९५२ ताणी पत्रकारिता पेटै काम कर्यो। इणी दिनां आप साधना प्रेस, राजपूत प्रेस, जयपुर मांय काम कर्यो। सन् १९५२ सूं १९८२ ताणी इंडियन रेडोास सोसाइटी, राजस्थान रा संगठन सचिव रै रूप मांय काम कर्यो अर आखै राजस्थान बडम पायी।

सन् १९५३ मांय राजस्थान भाषा प्रचार सभा री थरपणा कर`र रावतजी सभा रा संस्थापक सचिव बण्या। इणी संस्था सूं ‘मरुवाणी` राजस्थानी मासिक री सरूवात हुयी। फगत मरुवाणी रै जोगदान पेटै रावतजी नै आखो राजस्थानी कड़ूम्बो कदै-ई नीं भूल सकै। मरुवाणी अलेखूं राजस्थानी लिखारा त्यार कर्या अर राजस्थानी भासा नै अेक गति दीन्ही।

राजस्थान भाषा प्रचार सभा, जयपुर रै कामां मांय राजस्थानी पारखी, राजस्थानी विशारद, अर राजस्थानी प्रथमा परीक्षावां रो संचालण जबरो काम गीणीजै। अैड़ो काम राजस्थानी मांय फगत रावतजी अर कर्यो, आजताणी दूजो कोयी नीं कर सक्यो है। रावतजी आं परीक्षावां री व्यवस्था अेक विश्वविद्यालय री परीक्षावां भांत करता अर आखै देस मांय राजस्थानी सूं जुड़ाव राखणवाळा नै परीक्षा केंद्र सूंप`र परीक्षावां आयोजित करवांवता। चूरू मांय श्री बैजनाथजी पंवार, बिसाऊ मांय डॉ. उदयवीर शर्मा, बीकानेर मांय श्रीलाल नथमलजोशी इण केंद्रां रा संचालक हा। आखै देस रा अलेखूं विद्यार्थियां परीक्षावां दीन्हीं अर राजस्थानी सीख`र राजस्थानी सूं जुड़्या।

लेखन रै औळै-दोळै आपां रावतजी री बात करां तो वां री बीस सूं बेसी पोथ्यां विद्वता री साख भरै। महादेव पार्वती री वेलि, दळपत विलास, डिंगल गीत, चंदायन, प्रबंध पारिजात, जसवंतसिंघ री ख्यात आद रो संपादन कर`र जूनी राजस्थानी नै नुंवै ढंग सूं पळोटी। रावतजी आज री कवितावां, आज री राजस्थानी कहाणियां पोथ्यां रै मारफत आधुनिक राजस्थानी नै नुंवां संदर्भ दीन्हां। मीणा इतिहास, आइडेण्टिटी ऑफ रावल्स इन राजस्थान पोथ्यां रावतजी री इतियासूं दीठ नै चवड़ै करै।
दुरसा आढ़ा, प्रिथीराज राठौड़ री जीवनीपरक पोथ्यां मांयली रावतजी री टीप विद्वता बखांणै। जफरनामो अर बसंरी अनूदित पोथ्यां रावतजी नै जबरो अनुवादक घोषित करै। राजस्थानी साहित्यकार परिचय कोश रो दो भाग जकां देख्या है, वै जाणै कै रावत जी कित्ता मिणत करणवाळा मानवी हा। औ पैलो प्रयोग सांवठो हो।
रावतजी री कविता पोथी ‘बखत रै परवांण` किण सूं अछानी है। रावतजी री मौलिक सिरजणां इण पोथी मांय भेळी है। जकी वांनै अमर राखसी।

खुद रै लेखण सूं बत्ती रावतजी दूजां रै लेखण सूं मोह राखता। दूजां री रचनावां सुधारण अर छपावण पेटै वां रो घणो-ई बगत जाया होंवतो। पण वो बखत राजस्थानी नै अेक गरबीलो इतियास देयग्यो। श्री यादवेन्द्र शर्मा चंद्र रो उपन्यास ‘हूं गोरी किण पीव री`, छत्रपतिसिंह रो उपन्यास ‘तिरसंकू`, मनोहर शर्मा संपादित ‘कुंवरसी सांखलो` रामनाथ व्यास परिकर री काव्यकृति ‘मनवार`, धोकळसिंह री ‘मरु महिमा` मदनगोपाल शर्मा री ‘गोखै ऊभी गोरड़ी` आद पोथ्यां रावतजी री अगवाणी पांण साम्ही आयी। अै सगळी पोथ्यां आज राजस्थानी साहित्य रै इतियास मांय सोनल आंकां मांय चिलकै।
‘राजस्थान का साहित्यकार : समस्याएं और समाधान`, ‘राजस्थानी और हिन्दी : कुछ साहित्यिक संदर्भ` आद दस्तावेज रावतजी री जबरी दीठ रा गवाह है।
अै तो फगत गिणावण जोग रावतजी रा कारज है। अेक संस्था री मानिंद रावतजी आखी उम्र काम कर्यो। संस्था मांय घणा इस्या काम हुवै, जका नींव रा भाटां री दांईं चवड़ै कोनी दीखै, पण हुवै घणा महताऊ। रावतजी जका काम कर्या अर आखै राजस्थानी भासा समुदाय नै जकी टीम सूंपी, वा गिनार करण जोग बात है।

१६ दिसम्बर, १९८६ नै रावतजी देवलोक हुया।
आपां सगळां नै रावत जी माथै गरब अर गुमान करणो चाहीजै। खासकर इण कारणै कै वै अेक सांचला राजस्थानी हेताळू हा, अर आखी जिंदगाणी ताणी काम करता रैया। रावतजी पढ़ाई मांय जबरा हुंसियार हा अर वै चांवता तो उण बगत घणी आच्छी नौकरी पकड़ सकै हा, पण वां आपरी चावणा फगत राजस्थानी भासा सेवा मांय लगा दीन्ही। तद ईज तो वै आज अमर है।

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राजस्‍थानी खातर राजस्‍थानी लोग बहोत कीं कर रैया है। पण, प्रवासी राजस्‍थानियां रो जोगदान देखण जोग है। वां री हूंस अर भासा विगसाव रा सुपना सरावण री गत पाळै। राजस्‍थान मांय जद लोग राजस्‍थानी बोलण सूं अळगा हुंवता जाय रैया है तद दूजा प्रांतां मांय वांनै घरां राजस्‍थानी बोलतां देखां तो मनड़ो उणां नै निंवै।

अठै एक एड़ा बंधु श्‍याम गोइन्‍का रो परिचै दीरीजै जका राजस्‍थानी बोलै ई नीं आपरी कमायी सूं राजस्‍थानी नै पोखै।

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राजस्‍थांनी सारू लिछमी रो खजाना खोल्‍यां बैठ्या है : श्‍याम गोइन्‍का

कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन, मुम्‍बई रा प्रबंध न्‍यासी श्‍यामसुंदर गोइन्‍का रो परिचै दीरीजै। औ परिचै हिंदी मांय है, वो  इण कारणै कै ओ कमला गोइन्‍का फाउण्‍डेशन री वेबसाइट सूं ज्‍यूं-रो-त्‍यूं लिरज्‍यो है।

श्याम गोइन्का : एक परिचय

जन्म :-
श्याम गोइन्का का जन्म २६ जनू, १९३७ ई. को ब्रह्म प्रदेश की तत्कालीन राजधानी मांडले में हुआ। इनके पिता उदारमना श्री गोपीराम गोइन्का व मातुश्री श्रीमती कमला गोइन्का थीं।
आनुवंशिक रूप से श्री गोइन्का की मातूभमि एवं पितृभूमि चूरू (राजस्थान) है, परंतु काफी अर्से पहले ही उनके पूर्वज बर्मा में जाकर बसे गए थे, इसीलिए श्याम गोइन्का का जन्म व लालन-पालन बर्मा में ही हुआ।

शिक्षा :-
श्याम गोइन्का का प्रारम्भिक अध्ययन ब्रह्मदेश व चूरू में हुआ। चूरू के सरदार विद्यालय में सन् १९४२ से १९४६ तक श्री श्याम गोइन्का पहली से पांचवीं तक पढ़े। श्याम गोइन्का ने सन् १९५६ में पंजाब विश्वविद्यालय से प्रभाकर (हिन्दी) की परीक्षा उत्तीर्ण की व सन् १९५८ में मद्रास यूनिवर्सिटी से एम.ए. (इतिहास) की डिग्री ली।
अक्टूबर, २००१ में श्याम गोइन्का को सृजनात्मक राजस्थानी साहित्य सेवा के लिए ‘राजस्थानी विकास मंच` द्वारा डाक्टरेट की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।

पारिवारिक वैभव :-
श्याम गोइन्का के पितामह श्री बसेसरलाल गोइन्का चूरू के संभ्रातजनों में से एक थे। वे व्यवसाय के सिलसिले में चूरू से निष्क्रमण करके सन् १८८५ में मांडले (बर्मा) में जाकर बस गए तथा द्वितीय विश्वयुद्ध (सन् १९४२) तक वहीं रहे। फिर वे चूरू आ गए और सन् १९४७ तक चूरू रहे। सन् १९४७ में गोइन्का परिवार को एक हिस्सा बर्मा व एक हिस्सा दक्षिण भारत चला गया।
श्री बसेसरलाल गोइन्का के उद्यमी पुत्र श्री गोपीराम गोइन्का के सुपुत्र श्याम गोइन्का हैं। रामगढ़-शेखावाटी के सराफ परिवार में इनका ननिहाल है।

श्याम गोइन्का का विवाह ७ मई, १९५६ ई. के दिन चिड़ावा के प्रसिद्ध अड़ूकिया परिवार की सौभाग्यवती स्नेहलता से रंगून (बर्मा) में हुआ। श्रीमती स्नेहलता का २८ मई, २००२ ई. को आकस्मिक देहांत हो गया। श्याम गोइन्का के श्रीमती स्नेहलता से दो पुत्ररत्न राजीव व अचल हैं।
पुत्रवधुओं में बड़ी पुत्रवधू निर्मला व छोटी ललिता है। चार पौत्र-पौत्री तन्वी, कनिका, जूही एवं शुभम् हैं। बड़ी पुत्रवधू निर्मला कर्त्तव्यपरायण, बुद्धिमती एवं सुशील हैं। छोटी पुत्रवधू ललिता गोइन्का काफी कुशाग्र बुद्धि की धनी हैं। चित्रकला तथा साहित्य लेखन ललिता गोइन्का की अभिरूचि के अंग हैं।

जीवन की दिशा :-
श्याम गोइन्का अपने पितामह व पिताश्री की भांति ही सहनशील व्यक्ति हैं। उन्होंने जहां एक ओर अपने वंशानुगत व्यवसाय को अपनी सामर्थ्य से नए आयाम दिए, वहीं अपनी सृजनधर्मिता से साहित्य लेखन में अनूठी मिसाल कायम की है। साहित्य व व्यवसाय श्याम गोइनक को जीवन की दो समान्तर दिशाएं बन गई हैं। अध्यात्म की ओर झुकाव तो त्रिवेणी की स्थिति निर्मित करता है।

आध्यात्मिक जीवन :-
जीवन की व्यवस्तता के बावजूद भी श्याम गोइन्का योग व तंत्र-साधना को सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं। पारमार्थिक सामाजिक दायित्व के संग-संग निजी आध्यात्मिक प्रगति को वे समान रूप से बल देते हैं। एतदर्थ उनके जीवन का मूल लक्ष्य है- आत्ममोक्षार्थम् जगत् हितायच। जो उन्हें जीवन के मूलमंत्र स्वरूप अपने परम् गुरुदेव श्री श्री आनंदमूर्ति जी द्वारा वरदान स्वरूप मिला है।
परिवार व समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का सही निर्वाह करते हुए, उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन के मूल लक्ष्य को कभी नहीं बिसारा, यही उनके व्यक्तित्व की वैशिष्ट्य है।

व्यवसाय :-
श्याम गोइन्का को व्यवसाय वंशानुगत मिला। अपनी सामर्थ्य व शक्ति का समुचित उपयोग करते हुए उस व्यवसाय को उन्होंने बड़ी मुश्तैदी के साथ आगे बढ़ाया।
श्याम गोइन्का ने ‘गो-गो इंटरनेशनल` फर्म का आगाज किया और व्यवसाय को एक नया स्वरूप दिया। सिले-सिलाए कपड़ों का उत्पादन एवं निर्यात के क्षेत्र में आज ‘गो-गो इंटरनेशल` का अहम् मुकाम है। श्याम गोइन्का की क्रियाशील बुद्धि का उनके सपुत्रों राजीव व अचल ने व्यावसायिक उपयोग किया व व्यवसाय के क्षेत्र में अपनी सर्वव्यापी पहचान कायम की। आज बैंगलोर (कर्नाटक), तिरुपुर (तमिलनाडु), मुम्बई (महाराष्ट्र), लुधियाना (पंजाब), काठमांडू (नेपाल) और पेरिस (फ्रांस) में गो-गो इंटरनेशनल की शाखाएं-प्रशाखाएं अपने विस्तृत रूप के साथ स्थापित हैं।

लेखन :-
अपने भावों को अभिव्यक्ति देना एक सरल कार्य नहीं है और वह भी लेखन के माध्यम से। लेखन जहां पूर्ण मनोयोग चाहता है, वहीं वह चाहता है पूर्ण रूप से शांत माहौल एवं एकांत।
व्यावसायिक गतिविधियों की क्रियाशीलता के बीच मानस को सृजन की ओर मोड़कर लिखना आसान नहीं होता। श्याम गोइन्का ने इन्हीं असुविधाओं के मध्य अपनी लेखनी की पहचान कायम की है।
हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में श्याम गोइन्का ने पर्याप्त रूप से लिखा है। गद्य एवं पद्य दोनों में सृजन करने वाले श्याम गोइन्का को मूल प्रसिद्धि उनके लिखे व्यंग्यों से मिली। कठोर से कठोर बात को व्यंग्य के माध्यम से सरल रूप में कहने की कला श्याम गोइन्का की लेखनी की करामात है। देश की राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक आपाधापी, सामाजिक सरोकारों की पैरवी, व्यक्तिवाद की छाप जैस विभिन्न पहलुओं को रूपांकित करते श्याम गोइन्का के व्यंग्य देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों को झकझोरते रहते हैं। पुस्तकाकार रूप में भी ये व्यंग्य बड़े प्रशंसित हुए।
श्याम गोइन्का की प्रकाशित पुस्तकों में प्रमुख हैं :-
हिन्दी व्यंग्य कृतियां :
श्याम गोइन्का के हिन्दी में दो व्यंग्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं-
१. नसबंदगी
२. गंजत्व दर्शन

आध्यात्मिक कृतियां :
आध्यात्म की ओर श्याम गोइन्का का झुकाव युवाकाल से ही रहा। आध्यात्मिक गुरु श्री श्री आनंदमूर्ति जी के सान्निध्य ने उनकी लेखनी को और सशक्त किया। श्याम गोइन्का की प्रकाशित आध्यात्मिक कृतियां हैं-
१. पुण्य स्मरण
२. पुण्य स्मरण-१
३. पुण्य स्मरण-२
४. पुण्य स्मरण-३
५. प्रयाणोत्तर प्रणय प्रलाप
६. नमामि कल्याण सुन्दरम्-१
७. नमामि कल्याण सुन्दरम्-२
श्याम गोइन्का ने अपनी आध्यात्मिक कृतियां ‘हमराही` के छद्म नाम से लिखी हैं।

मातृभाषा राजस्थानी में सृजन :
गौरतलब है कि हिन्दी के अलावा श्याम गोइन्का ने अपनी मातृभाषा राजस्थानी में भी पर्याप्त योगदान दिया है। राजस्थानी में इनका एक मूल एवं दो अनूदित राजस्थानी व्यंग्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं-
१. बनड़ा रो सौदागर
२. लोढ़ी मोडी मथरी
३. गादड़ो बड़ग्यो

श्याम गोइन्का ने राजस्थानी में व्यंग्य गजलों का भी नया प्रयोग किया है। ये गजलें विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। पुस्‍तक रूप में भी यह प्रयोग आया-

1. ठा नीं सा !

श्याम गोइन्का मानते हैं कि लिखने की रूचि उन्हें विरासत में मिली। अग्रज सत्यनारायण गोइन्का (विपश्यना साधना के गुरुदेव) लिखने में बेजोड़ माहिर हैं, वे ही उनके प्रेरणा-स्रोत रहे हैं।

व्यावसायिक भागदौड़ के बीच लेखन को श्याम गोइन्का दुष्कर नहीं मानते। वे सोचते हैं कि- ”जब रूचि हो तो समय निकालना असंभव नहीं। भागदौड़ से आज कौन बचा है? सभी भागदौड़ में व्यस्त हैं, फिर भी अपनी-अपनी रूचि के लिए समय निकाल ही लेते है।, बशर्ते लगन हो।“

लेखन के प्रति परिवार का सदैव क्रियाशील सहयोग श्याम गोइन्का को रहा।

श्याम गोइन्का ने व्यंग्य विधा को ही प्रमुखता से क्यों लिया? वे इसका सीधा-सादा उत्तर संप्रेषित करते हैं कि व्यंग्य के माध्यम से बात को बड़े प्रभावात्मक ढंग से कहा जा सकता है व व्यंग्य में कही बात मन को झकझोरती है।
व्यंग्य विधा के चुनाव के विषय में गोइन्का मानते हैं कि व्यंग्य विधा में उन्हें काफी बाद में लिखना शुरू किया। मुम्बई प्रवास के दिनों में उनको पाड़ोसी व्यंग्य शिरोमणि श्री रामावतार चेतन (‘चक्कलस` के संपादक-संचालक) ने इस विधा की ओर उन्हें प्रेरित किया। एक स्वरूप में स्व। रामावतार चेतन ही उनकी व्यंग्य विधा के गुरु थे।
श्याम गोइन्का की भाषा बड़ी लालित्यपूर्ण है। वे बात को इस ढंग से कहते हैं कि पाठक रसास्वादन करते हुए आत्ममंथन के लिए मजबूर हो जाता है यथा- ”हम दूध के धोये हैं, दही से नहाए हैं, गंगा में डुबकियां लगाए हैं, जमना में मल-मल कर साबुन लगाए हैं। हमारे निर्मल अतीत के बारे में तुम क्या जानना चाहते हो? यह धवल अध्याय क्यों देखना चाहते हो? हमारा अतीत उतना ही उज्ज्वल है, जितना आज हमारी खादी का सफेद धुला वस्त्र!…….(कांटे की बात, ‘दूध के धोए`, नवभारत टाइम्स, मुम्बई, २ अगस्त, २००२)

श्याम गोइन्का के व्यंग्य वर्तमान विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हैं। वे अपराध के बढ़ते स्वरूप व अपराधियों के प्रति सामाजिक स्वीकृति को देखकर लिखते हैं- ”मेरे एक पुराने साथी जेल गए, छूटे तो मंत्री बन गए। जेल वह जगह है जहां मंत्री बनाने के परमिट बंटते हैं। कुछ लोग अंग्रेजों का मुकाबला करके जेल गए। आजादी मिली तो मंत्री बन एग। कुछ इन्दिरा के मुकाबले जेल गए। जले की हवा खाकर मंत्री बन गए। उनके जेल जाने की महाभारत मेरे घर की महाभारत बन गई। उनका जेल जाना मेरे जी का जंजाल हो गया। मेरी पत्नी साबुन से हाथ धोकर पीछे पड़ी हुई है, मुझे जेल भिजवाने पर तुली हुई है।“ (‘जेल जंजाल`, नसबंदगी)

वहीं बदलते राजनीतिक स्वरूप व बदलते राजनेता भी श्याम गोइन्का के व्यंग्य से कहां बच पाते- ”मिलन की सरगर्मी और मनुहारों का त्योंहार लिए चुलबुले चुनाव आते हैं। राजनीतिक हलचलों से चुनावव्रतियों को ‘चुनावोदय` का पूर्वाभ्यास मिल जाता है। आभास पाते ही वे चलते पुर्जे चुनाव की चहल-कदमी में जी-जान से जुट जाते हैं। ‘चुनाविक` प्रमाण और प्रार्थना-पतवारों को खेता हुआ न्योछावारों की नव पर चुनाव लड़ने चला जाता है।“ (‘चुनाव आये, चुनाव गयो`, गंजत्व दर्शन)
पद्य में भी श्याम गोइन्का की चुटीली व्यंग्योक्तियां दर्शनीय बन पड़ी हैं-
”जब जब उठे कावेरी का मुद्दा

तू कर नाटक्

इसी में तेरा भला है

सुन, कर्नाटक!“

इसी तरह-

”तेइस जनवरी के दिन

मैनें पूछा नेताजी से

सुभाष बाबू!

आप कब से अदृश्य हो गये

वे बोले जब से जैसे

सफेद टोपी वाले नेताजी हो गए।“

राजस्थानी भाषा में श्याम गोइन्का के व्यंग्य भी बड़े शानदार बन पड़े हैं। उनके राजस्थानी में अनूदित व्यंग्यों पर तो राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया। श्याम गोइन्का की राजस्थानी भाषा आमजन की बोलचाल की भाषा होने के कारण बड़ी लोकप्रिय है। राजस्थानी की नवीन व्यंग्य विधा में श्याम गोइन्का ने निश्चित रूप से एक मुकाम बनाया है। श्याम गोइन्का के विषय में राजस्थानी भाषा के साहित्यकारों व समीक्षकों ने बड़ी सटीक टिप्पणियां दी हैं। कुछ द्रष्टव्य हैं-

राजस्थानी के पुरोधा श्री किशोर कल्पनाकांत के अनुसार- ”श्री श्याम गोइन्का रो व्यंग्य लेखण, वेळा रै परवाण्, ऐक लाम्बै नैरन्तर्य सूं सधवा है अर सिद्धितणा सोपानां चढ़तोड़ो आपरी प्रतिभा`र ओळख ने परगासै है। अेक पूरै पाठै अभ्यास री पधेड़िया चढ़`र घाट-घाट घूम्योड़ो सधाव जुग तणी जुगत नै देखतो-भाळतो साहित्य सूं सांतरा सैनाड़िया करै अर विचारां चढ़तोड़ै कथ नैं, चायीजती चतरायां समेत ध्यान धकै धरै।“

राजस्थानी के प्रेमचंद माने जाने वाले कथाकार श्री बैजनाथ पंवार भी श्याम गोइन्का के व्यंग्यों में सुव्यवस्था स्थापना का संदेश देखते हुए कहते हैं- ”व्यंग्य विधा मांय श्याम गोइन्का नैं महारत हासिळ है। बै बडै सजोरै ढंग सूं सबदां री कारीगरी करै। पाठक कनै उणांरा व्यंग्य अेक बदळाव री पीड़ छोड`र जावै, जकी पाठक डुंगाई सूं महसूस करै।“

साहित्यकार एवं समीक्षक श्री चेतन स्वामी मानते हैं- ” हिन्दी मांय जियां शरद जोशी अर रवीन्द्रनाथ त्यागी री भासा पाठक नै अभिभूत कर देवै बियां ई राजस्थानी में श्याम गोइन्का री भासा राजस्थानी पाठक रा आखा अभरोसा दूर कर नांखै। श्याम गोइन्का कनै भासा रा कई आयाम है। वै अेकई पंगत सूं केई शिकार करै….।“

प्रसिद्ध व्यंग्यकार दुर्गेश के अनुसार- ”हिन्दी मांय प्रसिद्ध श्याम गोइन्का री लेखणी मायड़ भासा मांय इज सरावण जोग है। उणांरा व्यंग्य व्यवस्थावां माथै तगड़ो प्रहार करै अर नुंवै सोच रो बोध करावै।“

युवा साहित्यकार श्री रवि पुरोहित के अनुसार- ”गोइन्काजी रो पढ़ण गुणण अर सिरजण रचाव री दीठ न्यारी निरवाळी ई है। वै मननै री मनगत कै व्यवस्था री कुबध नै अधर`सी`क पकड़ै अर खिमता री खैचळ रै धकै ऊंडी-दर-ऊंडी सिरजण सोच री आंच सूं तपा`र पाठकां नै परोसै। अंतस री उडार अंवळाया कारीगर की कळाबाजियां सूं बंतळ कर नै रचना रूप धरै अर ओई कारण है कै लेखक री संवदनावां भणेसर्या री सरोकारां समचै साव सांची ऊतरै…।“

श्याम गोइन्का के आध्यात्मिक सोच ने उनकी लेखनी की प्रखरता को बढ़ाया है। उनके अध्यात्म की ओर रुझान से विचारों की निर्मलता व शाब्दिक शक्ति की वृद्धि स्वाभाविक है। संसार के सत्य की पहचान कर मर्म ने शब्दाकार लिया- ”…. जाहिर है, हर दुखी इंसान सुख की खोज में दीवाना है। पर कस्तूरी मृग की तरह उसे यह नहीं पता कि सगंध उसकी नाभि में है। वह सुगंध है ‘आनंद` की सुगंध, ‘नित्यानंद` की सुगंध। ‘संविद` चेतन होने के बाद इंसान इच्छित-वांछित आनंद का शोध शुरू कर देता है और ‘आह्लादिनी` प्रेरित सधे साधक नित्यानंद की खोज में लीन रहते है।…।“ (नमामि कल्याणसुंदरम- भाग एक)

श्याम गोइन्का की आध्यात्मिक कृतियों की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री शंकर पुणतांबेकर मानते हैं- ”अध्यात्म मन-प्राण की ऊर्जा, आत्मा की शांति है, इसमें संदेह नहीं। ऊर्जा हमारे भाव-विचार कल्याण या तीर्थों को उदात्त बनाती है और इस संसार को देखने की निष्काम दृष्टि देती है…।“

प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. तारादत्त निर्विरोध कहते हैं- ”अध्यात्मपरक होने के बावजूद जैसी किस्सागोई इनमें है। सोचता हूं, एक व्यंग्यकार इस प्रकार के प्रसंग भी लिख सकता है।“

राजस्थानी के आधार स्तम्भ श्री शक्तिदान कविया मानते हैं- ”श्याम गोइन्का का साहित्य सुन्दर भाषा शैली में मन को संस्कारित करने की मधुर एवं मर्मस्पर्शी पठनीय सामग्री का प्रसाद है…।“

सामाजिक क्रियाशीलता-
श्याम गोइन्का प्रभात संगीत के एक नए घराने से जुड़े ‘रिनासां आर्टिस्ट एण्ड राइटर्स एसोसिएशन` के मुंबई खंड के अध्यक्ष भी हैं। वे प्रभात संगीत के प्रसार के लिए कटिबद्ध हैं। प्रभात संगीत अनुसंधान समिति के वे सक्रिय संस्थापक सदस्य हैं। यह इस नवयुग का नया संगीत घराना है, जो नव्यमानवता का पोषक है।

बैंगलोर में हिन्दी साहित्यिक संस्था ‘शब्द` को अपना सतत् सहयोग प्रदान करते हुए श्याम गोइन्का संरक्षक का दायित्व बड़ी बखूबी निभा रहे हैं।

इन सबके अलावा श्याम गोइन्का विभिन्न स्वयंसेवी, सृजनात्मक संस्थाओं तथा पत्र-पत्रिकाओं के रचनाशील समूहों से जुड़े है। व अपनी क्रियाशीलता से सामाजिक सेवा में रत हैं।

पुरस्कार-
श्याम गोइन्का की व्यावसायिक कर्मशीलता ने उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठान ‘गो-गो इंटरनेशल` को दो बार सर्वश्रेष्ठ कोटि के निर्यात के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिलवाया है।

उनकी ‘बनड़ा रो सौदागर` पुस्तक के साहित्य अकादेमी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अनुदित व्यंग्य संग्रह (अनुवाद किशोर कल्पनाकांत) का पुरस्कार भी मिला है।

विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए सार्वजनिक अभिनंदन तो उनकी दृष्टि में कभी पुरस्कार की श्रेणी के नहीं माने जा सकते।

संप्रति-
साहित्यिक, व्यावसायिक व सक्रिय समाजसेवा में संलग्न।
स्थाई निवास-
‘मधुकुंज`, नंबर-११८, ७वां क्रास, ९वां मैन रोड, आर.एम.वी. एक्सटेंशन, सदाशिवनगर, बैंगलोर-५६००८०
दूरभाष : ०८०-२३६१०२८३, २३६१८७८१
फैक्स : ०८०-२८४६१३९५

इ मेल- sgoenka@gogoindia.com

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