धरोड़

राजस्थानी भासा मांय पत्र-पत्रिकावां रै तोड़ै रो रोवणो हरमेस रोइजै। आंगळयां माथै गिणां इत्‍ती पत्र-पत्रिकावां निसरती निगै आवै। पण, कदै-ई राजस्थानी रा सिरजणधरमी एकठ रूप मांय मिल-बैठ`र ओ विचार करयो है कै हाल तांईं कित्‍ता पत्र-पत्रिकावां निसर`र बंद हुयगा? अर बै क्यूं बंद हुया?
राजस्थानी पत्र-पत्रिकावां री गिणती घणी लाम्बी है। पचास सूं बेसी नांव तो म्हारै निगै आवै। जे हिन्दी संस्करणां मांय राजस्थानी भाग रो जोड़ और करां तो आ` गिणती कीं बेसी हुय सकै। कांईं आं रो एक न्यारो इतिहास कोनी? कांईं आं पत्र-पत्रिकावां रै सुमरण रै मिस आपां आं रै संपादकां-प्रकासकां री हिम्मत नै निंवण नीं कर सकां? आपां नै निंवण करणो चाइजै। कांईं आं पत्र-पत्रिकावां रो इतिहास आगली पीढ़ी सारू आपांनै एकठ कर`र नीं राखणो चाइजै? राखणो चाइजै।
पछै राखसी कुण?

आपां ई तो।

चार अंकां री पड़ताळ
नुंवीं बणगट रो हेलो हो- तिमाही ‘हेलो`

”….. समस्यावां ओजूं बिसी ही पड़ी है, बधी है जकी पाखती में। बां कांनी ध्यान देवणियां न राजनीति आळा है अर न दूजा ही। पांच बरसां सूं एकर दो बार चीणीं रा धोरा देखावणियां बीं नै जावै अर किंया हीं जाळ फरेब कर, आपरो नाको झाड़लै। ईं हालत में साहितकार रो किरतब है कै बो बांनै ईं अंधेरै सूं निकाळै, निकळण रो मारग बतावै अर बीं मारग माथै चालण में जे जूझणो पड़ै तो बीं खातर, बांनै त्यार करै। मूळ में बीं जनपद सूं जुड़योड़ी जनता रो भी एक जीवण संघर्ष है, नूंवा मूल्यां री बांरी लालसा है जकी सही दीठ रै अभाव में साव बेअरथी पड़ी है। बीं नै ताकत अर वातावरण देवण रो एक मात्र तरीको साहित ही है।“

– डॉ. मेघराज, संपादक ‘हेलो`

राजस्थानी पत्रिकावां मांय ‘हेलो` पत्रिका रो आपरो न्यारो-निकेवळो योगदान है। नुंवी चेतना री राजस्थानी तिमाही ‘हेलो` बीकानेर सूं डॉ. मेघराज रै संपादन मांय निसरी। सन् १९७४ इण रो जलम बरस हो। पैलो अंक अप्रेल-जून, १९७४ हो।

नुंवी चेतना इण पत्रिका रो ध्येय हो। पैलै अंक रै संपादकीय मांय संपादक हेलो करै- ”राजस्थानी में नूंवै रै नाम पर लिखण वाळा री विगत लारला बरसां में घणी बधी है। नूंवै भाव बोध अर मान मूल्यां नै ले, लिखण आळा खासा सामां आया है। बां लोगां सामी मूळ समस्या है बा है- छपण री………… राजस्थानी पत्र-पत्रिकावां रै चौगड़दे जद नजर पसार देखां तो दीखै कै राजस्थानी मांय इण भांत आवाज नै बुलन्द करण आळी पत्रिकावां री घणी कमीं है। ईं पत्रिका रै प्रकासण रो उद्येश इण ही भांत रै साहित नै पनपावण रो है, जिको जनता रो साहित हूसकै अर जनता री जरूरत रै मुजब साहित समाज नै दे सकै।“
पैलै अंक मांय मनुज देपावत (रे धोरां आळा देस जाग), नंद भारद्वाज (थांरी आंख्यां सामी), अन्नाराम सुदामा (अनाम संज्ञा), मो. सद्यीक (बतळावण), भंवर भादानी (दीठ सूं परे काल) अर धनजंय वर्मा (चुप रह कीं मत कै) री कवितावां ही तो सांवर दइया (जुड़या-कटया) अर सुदामा (आदत) री कहाणी भेळी ही। विस्णु दे री बंगाली कविता ‘ब्लड प्रेसर` अर ग. मा. मुक्तिबोध रै हिन्दी लेख ‘नूंवी कविता : एक जिम्मो` रो उल्थो ईज इण अंक मांय दीरीज्यो। गोवर्द्धन शर्मा ‘परख` पेटै श्रीलाल नथमल जोशी री पोथी ‘धोरां रो धोरी` री कूंत करी।

हेलो-२, जुलाई-सितम्बर, १९७४ मांय आयो। जुगल परिहार (दुख क्यूं व्है), नारायणसिंह भाटी (कविता रा आखर), भवानीशंकर व्यास (भूख रौ पड़ूत्‍त्तर), सत्येन जोसी (बदळाव रै पार) अर राजेन्दर बोहरा (अै सुपना, बै सुपना) आपरी कविता रै साथै अंक मांय हा। कहाणी फगत एक मोहन आलोक (कुम्भीपाक) री दीरीजी। गोवर्द्धन हेड़ाऊ (दो-दो हाथ गरीबी सूं) व्यंग मांडयो अर अन्नाराम सुदामा (मिली भगत) एकांकी। क्रिस्टोक्रोफर कॉडवेल रै लेख ‘इल्यूजन एण्ड रीयलिटी` रै अंशां रो उल्थो ‘कविता रौ जलम` नांव सूं नंद भारद्वाज करयो जद कै नमिता सिंह री हिन्दी कहाणी रो उल्थो खुद संपादक ‘खुलै आभै हेठै` नांव सूं कर`र पाठकां नै समकालीन दीठ अर लेखन सूं रू-ब-रू करावण रा जतन करया। ‘परख` मांय प्रहलाद ओझा दो पोथ्यां ‘रोहिड़ै रा फूल` (डॉ. मनोहर शर्मा) अर ‘हांस्यां हरि मिलै` (नृसिंह राजपुरोहित) री जांच-पड़ताळ करी।
इण अंक मांय संपादक जूनै बगत सूं एक-ई परिपाटी रै पाखती चालतै राजस्थानी लेखन माथै चिंत दीखाई- ”सरजण रै नाम बां कदेई बठली समस्यावां अर सिसक्यां सूं पाठकां रो परिचै नहीं करायो- चांदी सी रेत, मिण सा कैर, चोखा खोखा, झूंपड़ा में बसतो भोळो भाळो मतवाळो साधु जीवण बठै रो, खीर खांड अर घी घेवर रा भोजन बठै, पदमणियां नै मात करती पिणघट जांवती हूंस गमणी अर देव दुरलभ ढुळती जवानी-ईं ढंग रै मोहक शब्दजाळ में, गांव रै सिसकतै-बिलखतै टूटयेड़ै-बिखरयेड़ै, पींचीजतै अर रुंधतै जीवण नै ढक राख्यो है तो बा रचना काळपात्र में राख`र कठै ही जमी दोट रैणी चाइजै, राम राज जिसी बेळा कदेई आसी तो बींरो मोल तोल आपै ही बधसी। खेजड़लो, नीमड़ली, मोरियै, कागलै अर कुरजां री ओट में कित्‍ताक दिन लुक्‍योड़ा रैसो अर रैणो ही चावो तो गळी आळां रै सागै क्यों रोळो करो अर क्यों बारै बिचाळै धसो।“

जनवरी-मार्च, १९७५ रो अंक हेलो-४ हो। इण मांय राजेन्द्र बोहरा (थोड़ो ठैरणो पड़सी), ओंकार पारीक (मिनख अर पत्थर), किशोर कल्पनाकांत (कूख पड़यै री पीड़), अर्जुनदेव चारण (हिसाब री बसूली) अर जुगल परिहार (पहलै तारै रै प्रति) री कवितावां ही। कृष्ण कल्पित अर मोहन आलोक रा गीत हा। ‘नुंवै लेखण री फौरी अबखायां बाबत` नंद भारद्वाज रो लेख अर अन्नाराम सुदामा री एकांकी (उठती दुकान) इण अंक री महताऊ रचनावां ही। गोवर्द्धन हेड़ाऊ रो व्यंग (असली हिन्दुस्थान रो बासौ) अर हरीश भादानी री करयोड़ी पोथी परख (अंधार पख) अंक री साख बधावै ही। अमरीकी निग्रो कवित लूसी स्मिथ री कविता ‘गरीबी` अर वियतनामी कहाणीकार वो एन न्ह री कहाणी ‘आग` अंक री धरोड़ ही।

हेलो-८, जनवरी-मार्च, १९७६ मांय नंद भारद्वाज (उळझ्योड़ी पगडांडया, चिंता रौ आगोतर), बी.आर. प्रजापति (बै लोग) अर लीला मालवीय (गुळ बांट) री कविता, रामनिवास शर्मा (संकड़ीजतो जीवण : छूटतो पल्लो) अर सांवर दइया (जीवती ल्हासां) री कहाणी, सुरेश राही रो व्यंग्य (म्हारो धरम करम कुरसी) अर डॉ. रामबक्ष रो लेख ‘आलोचना री जरूरत` भेळा हा। संपादकीय ई ‘आलोचना री जरूरत अर जिम्मो` शीर्षक देय`र राजस्थानी मांय आलोचना री दरकार दीखांवतो हो। नाजिम हिकमत रै ‘तारन्ता बाबू रै नांव कीं कागद` रो उल्थो नंद भारद्वाज, लुदबिक अश्केनोजो री चैक कहाणी ‘एक आदमी` रो उल्थो आत्माराम अर शंकर कुरुप री ‘बांसरी` कविता रो उल्थो वेदव्यास कर`र अंक भेळो कीन्हो।

इण भांत देख्यो जा सकै कै ‘हेलो` एक नुंवै सोच अर नुंवै बोध रै साथै खड़ी होवण वाळी पत्रिका ही। नुंवी बणगट साथै रचनावां कसाव लेय`र आयी। आ आधुनिक राजस्थानी खातर भलेरी बात ही। भासायी विकास रै सीगै पत्रिका रो जोगदान कदै-ई नीं भुलाइज सकै।

आज ‘हेलो` रा पुराणा अंक राजस्थानी साहित्य री धरोड़ है।

कियां भुलाईज सकै ‘ईसरलाट` रो जोगदान……

राजस्थान रै ढूंढ़ाड़ छेतर री ढूंढ़ाड़ी बोली राजस्थानी भासा रै बिगसाव मांय आपरो जबरो योगदान राखै। अठै रा बासिंदा आपरी अळगी सबद संपदा राखै, जकी सबदकोस भेळी हुय`र एक गरबीलो इतिहास बणावै। जैपर रै असवाड़ै-पसवाड़ै राजस्थानी (ढूंढ़ाड़ी) रा सबद आज ताणी नीं गम्या है तो वां रो मोटो कारण वांरी मांयली निजू सगति है। क्यूंकै महानगरीय शैली रै रामपटरोळ मांय ठेठ जमीनी हगीगत रो ठरको रैवणो मोटी बात है।
इण मोटी बात बिचाळै मोटो नांव चेतै आवै ‘ईसरलाट` रो।
‘ईसरलाट` राजस्थानी री चावी मासिक पत्रिका ही। ढूंढ़ाड़ी पुट रा जबरा कवि श्री बुद्धिप्रकाशजी पारीक री अणथक साधना रा खांटीला दो बरसां री मिणत। सन् १९७५ अर १९७६ दो बरस ‘ईसरलाट` लगोलग निसरी। महीनै री महीनै। ‘ईसरलाट` री प्रकाशक संस्थान ही- ‘जय` साहित्य संसद, जयपुर अर अवैतनिक प्रधान संपादक हा- श्री बुद्धिप्रकाश पारीक।
मारवाड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, बागड़ी, मेवाती आद बोलियां रा लिखारा जद एकठ रूप मांय ‘राजस्थानी` री मानता सारू जतनां रो भारो बणावण लाग्या तद ढूंढ़ाड़ी रा कवि बुद्धिप्रकाशजी लारै कियां रैंवता! वां री मनसा ही कै आखै राजस्थान री बोलियां रो प्रतिनिधित्व करै एड़ी भासा ‘राजस्थानी` हुवै अर उण रूप मांय ढूंढ़ाड़ी आपरो जोगदान देवै। उणां री वां मनसा आजलग जारी है। वां ‘ईसरलाट` मांय लिख्यो- ”मनैं पूरो पूरो भरोसो छै`क राजस्थानी का आंदोलन करता, ‘राजस्थानी` सबद कै तांईं सांचा अर ईमादार होला……. प्रांत मैं चालू मारवाड़ी, मेरवाड़ी, हाड़ौती, मेवाड़ी, मेवाती ब्रज, ढूंढ़ाड़ी, सेखाटी अर बागड़ी नैं समचै ले`र चालैला अर ईं काम कै तांईं ढूंढ़ाड़ वांनै पूरो पूरो सा`रो देबा मैं पाछै कोनै र्हैलो। यो मैं बिसवास दिखावूं छूं।“
‘ईसरलाट` रै प्रथम अंक सूं पैलां बुद्धिप्रकाशजी एक बानगी अंक निकाळयो। ओ वांरो एक निजू प्रयोग हो। बानगी अंक विजयादशमी, सन् १९७४ नै साम्ही आयो। इण अंक रै प्रकासकीय मांय लिखीज्यो- ”ईसरलाट आपका समरथ हाथां मैं, हरख सैं हबोळा लेता हुया हिया का ईं बिस्वास की साथ साथ सौंपी जा रही छै`क या आपनै अवस्य दाय आवैली। मातभोम की रुखाळी मैं मर मिटवाळा वीरां की भोम राजस्थान की भी राजधानी गुलाबी नगर जयपुर सैं उजागर होबाळी या पैली`र एकली पतरी छै।“
इण अंक मांय-ई लिखीज्यो- ”आप लोगां का आसरा सैं ईं आबाळी ३१ दिसम्बर, १९७४ की रात नैं ‘जय` साहित्य-संसद्, जयपुर का वार्सिक विराट् कवि सम्मेलन का मंच माळै हजारां साहित्य-रसिकां कै सामनै ईं को जनम हो रह्यो छै।“
बानगी अंक पेटै श्री कपूरचंद कुलिश, दुर्गालाल बाढ़दार अर ताराप्रकास जोसी परामर्शदाता रै रूप मांय चोड़ै करीज्या। कुल २५ पानां रो ओ` अंक हो। रचनाकारां री पंगत मांय कवि रूप सूं डॉ. उजला अरोड़ा, रामरतन नीरव, कमल सोनी, उषा गोयल, तारादघ निर्विरोध,
सुलतानसिंह प्रेम, मोहन शैदाई, जयन्तिप्रसाद माथुर बादल अर गद्य रचनाकार रूप सूं कौशलकिशोर भाटी, गुमानसिंह सेखावत, रविकांत चौधरी, रेवाशंकर शर्मा, सीताराम पारीक ऊभा हा। इण अंक मांय गीत, कविता, बालगीत, निबंध, एकांकी, बालकथा, बोधकथा अर अनुवाद जैड़ा सगळा थम्म हा। एक सांवठी पत्रिका रै जलम री अगाऊ खुशखबरी ही।
जनवरी, १९७५ अंक ‘ईसरलाट` रो घोसित पैलो अंक (जनम अंक) हो। इण अंक मांय परामर्शदाता पेटै श्री कपूरचंद कुलिश, दुर्गालाल बाढ़दार, ताराप्रकास जोसी रै साथै मालीराम वर्मा अर रामचरण शर्मा व्याकुल रो नांव और भेळो हो। इण अंक मांय कल्याणसिंह राजावत, त्रिलोक गोयल, वल्भेश दिवाकर, डॉ. नरेन्द्र भानावत, दीनानाथ पारीक दिनेश, दुरगादानसिंह गौड़, नित्यानंद शर्मा नित्य, आशादेवी शर्मा बग्गड़, प्रेमजी प्रेम, सवाईसिंह धमोरा, आचार्य सीताराम पारीक, शंकर टांक, गिरधारीलाल मालव, लक्ष्मीशंकर दधीच, मोहन मण्डेला, डॉ. मदनगोपाल शर्मा, किशन दाधीच, डॉ. उजला अरोड़ा, रामचरण शर्मा व्याकुल आद री काव्य रचनावां ही तो रतिकांत चौधरी (व्यंग्य एकांकी- चपड़सी संघ), डॉ. शंभुसिंह मनोहर (कहावत आलेख-खैबत मैं ईं कचै), गोपाल नारायण बोहरा (निबंध- ढूंढाड़ महातम), चंद्रकुमार सुकुमार (व्यंग्य- मिलै बेटा रामलखन नै), पांच (निबंध- रामपाळी भाटी), घनश्याम लाल जोशी (निबंध-आत्मा की पुकार), डॉ. गोविन्दशंकर शर्मा (निबंध- ढूंढ़ाड़ी का अबार का साहित्यकार) री गद्य रचनावां ही। कुल-मिलाय`र ओ अंक ७३ पानां रो जबरो अंक हो।
रचनागत अर भासागत अंक री खैचळ बडमजोग ही पण इण अंक री एक कमी चौड़ै हुवै कै मुखपृष्ठ माथै ‘राजस्थानी मासिक` लिख्यां होंवतां थकां ई नरेश कमठान इटावा, ताराप्रकाश जोशी, राजेश रेड्डी, बलवीरसिंह करुण, गोपालप्रसाद मुद्गल, डॉ. पद्माकर शर्मा, जीवनसिंह मानवी, हरिराम आचार्य, अनिल चौरसिया अर मोहन शैंदाई री हिन्दी रचनावां घालीजी।
आगला अंकां री संपादकी की सावळ करीजी अर रचनावां रो चुनाव सोच-समझ`र करीज्यो। कठै-कठै जरूर आज री गत सूं संपादकी माथै आंगळी कर सकां हां पण बगत री मांग अर पत्रिका रै लगोलगपण री बै मजबूरिया दीसै।
फरवरी, १९७५ रै २५ पानां वाळै दूजै अंक मांय पं. दीनानाथ पारीक दिनेश, त्रिलोक गोयल, विनयकुमार शर्मा, वेदप्रकाश दाधीच, कल्याणसिंह राजावत, गोपालप्रसाद मुद्गल, सुलतानसिंह प्रेम, तारादत्‍त निर्विरोध, आचार्य सीताराम पारीक, दामोदरदास टाटीवाला, डॉ. शंभुसिंह मनोहर, रामप्रसाद मधुकर, वैद्य हरिमोहन शर्मा, रामगोपाल विजयवर्गीय री रचनावां भेळी ही। सगळी रचनावां राजस्थानी मांय। अंक रो फुटरापो देखणजोग।
मार्च, १९७५ अंक ई २५ पानां रो हो। श्री सुलतानसिंह प्रेम, रामपाळी भाटी, सवाईसिंह धमोरा, डॉ. शंभुसिंह मनोहर, कांतिचंद्र भारद्वाज, सीताराम पारीक, बजरंगलाल पारीक, विजयशंकर शास्त्री, रतिकांत चौधरी री रचनावां इण अंक री ओपमा बधावै ही।
‘ईसरलाट` रो अप्रेल, १९७५ अंक कंडवारो अंक हो। कुल २५ पानां मांय भौंरीदेवी पारीक, ज्ञानदत्‍त सिद्ध, सवाईसिंह धमोरा, रतिकांत चौधरी, शंकर पारीक निराश, ओंकारलाल बोहरा, शिवेन्द्र सुमन, कैलाश गौड़, चंद्रकुमार सुकुमार, डॉ. शंभुसिंह मनोहर अर दामोदरदास टाटीवाला रो रचनात्मक योगदान हो।
मई, १९७५ नारी अंक हो। आकारगत सरूप तय हुयग्यो हो २५ पानां। नारी अंक पेटै संपादकीय मांय लिखीजै- ”ईसरलाट तो आप नै आपका घर की लुगायां का बारा मैं बतावैली`क बै कांई छै, कसी`क छै? दुनियां की दौड़ मैं वांको नम्बर कोडै छै……।“ इण अंक मांय (देज-लेज… बंद करो), सवाईसिंह धमोरा (बागड़ की मीरां-गवरी बाई), ललिता पारीक (डायजो), शांता भानावत (समाजसेवा का कामां मैं लुगायां) आद नारी विषयक रचनावां सांतरी संपादकीय दीठ रो नमूनो है।
जून, १९७५ रो अंक आवरण माथै महाराणा प्रताप री सो`वणी फोटू साथै आयो। इण अंक मांय गुमानसिंह शेखावत, सुजानसिंह प्रेम, घनश्यामलाल जोशी, प्रेमचंद रांका राकेश, विनय कुमार शर्मा अर रतिकांत चौधरी री रचनावां ही। जुलाई, १९७५ ईसरलाट रो सातवां अंक हो। रचनावां री दीठ सूं पत्रिका लगोलग सुधरती जावै ही। भासा री दीठ सूं ई सावचेत ही। संपादकीय मांय मायड़ भासा री मानता सारू कलम जागै ही- ”आजादी को यो ई अरथ समझावा नै ईसरलाट ऊबी हुई छै। गुलाम की गली पटिया सैं जकड़ दियो जाय छै जींसै वो आपकी भासा कोनी बोल सकै। जै आपां आजाद रैबो चावां छां तो सबसैं पैली आपानै मातभासा मैं बोलणो पढ़णो अर लिखणो चायजे।“
इण अंक मांय काव्य रै पख मांय कल्याणसिंह राजावत, सुलतानसिंह प्रेम, लूणसिंह करणीसुत लखावत, सवाईसिंह धमोरा, रामस्वरूप परेश, भागीरथसिंह भाग्य, अवधेश कुमार शर्मा आद खड़या है तो गद्य रै पख मांय कोशलसिंह भाटी, रतिकांत चौधरी ईज है। इण भांत ओ अंक काव्यांक कैयो जा सकै।
अगस्त, १९७५ अंक स्वाधीनता अंक मांय मदमोहन सिद्ध, रामप्रसाद मधुकर, श्रीमती रामपाळी भाटी, सौभाग्यसिंह शेखावत, घनश्यामलाल जोशी, गोपालप्रसाद मुद्गल, कोशलकिशोर भाटी, नित्यानंद शर्मा अर डॉ. मनोहर शर्मा री रचनात्मक हाजरी ही। शंकरदान सामौर रो डिंगळ गीत अंक री ओपमा ही।
सितम्बर, १९७५ अंक मांय सौभाग्यसिंह शेखावत, धोकळसिंह चरला, सुमेरसिंह शेखावत, लेफ्टीनेण्ट पूरणसिंह शेखावत, पं. श्यामसुंदर शास्त्री, बंसीधर भावन, आचार्य सीताराम पारीक, मदनमोहन सिद्ध री रचनावां ही। ‘ईसरलाट` रो अक्टूबर, १९७५ अंक दीवाळी अंक हो। प्रेमजी प्रेम, सवाईसिंह धमोरा, पृथ्वीराज चौहान प्रेमी, डॉ. मनोहर शर्मा, डॉ. जयचंद्र शर्मा, रामनिरंजन शर्मा ठिमाऊ अर गोपालनारायण बहुरा इण अंक रा रचनाकारा हा।
नवम्बर, १९७५ अंक मांय सवाईसिंह धमोरा, मदनमोहन सिद्ध, चंद्रदत्‍त भावन, विनोद सोमाणी हंस, सुलतानसिंह प्रेम री रचनावां ही। दिसम्बर, १९७५ अंक मांय मदमोहन सिद्ध, मुन्नीदेवी सांधी, गिरीश चतुर्वेदी, कल्याणचंद्र त्रिखण्डी, आशादेवी शर्मा, रामनिरंजन शर्मा ठिमाऊ, गौतम चंद्रुल, मोहन शैदाई री रचनावां ही। संपादक बुद्धिप्रकाश पारीक ‘मैं कविता क्यूं लिखूं छूं` मांय टाळवां बात लिखी। इण अंक नै संपादक ‘कवि-सम्मेलन अंक` री गत सूं देखै। अंक मांय गिरिराज प्रसाद विप्र तिवारी, भवानीशंकर व्यास विनोद अर राकेश री हिन्दी रचना जरूर खटकै।
पैलै बरस मांय ‘ईसरलाट` राजस्थानी साहित्य नै घणां नुंवा रचनाकार अर रचनावां दीन्ही। हरेक अंक मांय कवि बुद्धिप्रकाश री रचनावां ई न्यारी साख राखी।
दूजै बरस रै कीं अंकां री पड़ताळ करां तो होळी अंक-मार्च, १९७६ मांय अब अकल ठिकाणै आई है (नानूराम संस्कर्ता), फाट्योड़ा तम्बू (प्रेमजी प्रेम), सींगसीट (रामनिरंजन शर्मा ठिमाऊ), लेखराज व्यास (बिस`र विस्वासा) अर गीत गंगाजळी (डॉ. मदनगोपाल शर्मा) रचनावां सरावणजोग है। गुलजारीलाल माथुर, दामोदरदास टाटीवाला, भक्त कवि जुगल, कैलाश मनहर, रामपाळी भाटी री रचनावां ई अंक री ओपमा ही।
अप्रेल, १९७६ अंक दूजै बरस रो चौथो अंक हो। त्रिलोक गोयल, कुसुम जोशी, विनोद सोमानी हंस, रामपाळी भाटी, तारादत्‍त निर्विरोध अर कल्याणसिंह राजावत साथै बुद्धिप्रकाश पारीक री रचनावां अंक भेळी ही। अंक मांय प्रूफ री गळत्या इण भांत कै अंक रो महीणो ई मार्च लिखीज्यो।
‘ईसरलाट` रो मई, १९७६ अंक लक्ष्मण शर्मा हितैषी, डॉ. कमलचंद सोगाणी, उर्मिला देवी शर्मा, डॉ. मदनगोपाल शर्मा, विनोद सोमानी हंस, डॉ. ललिता पारीक, पुष्पाकुमारी शर्मा, जयसिंह चौहाण जौहरी, आचार्य सीताराम पारीक, सवाईसिंह धमोरा, रामपाळी भाटी री रचनावां री साख भरावै हो। जून, १९७६ अंक दीनानाथ पारीक, लक्ष्मण शर्मा हितैषी, सत्यनारायण शर्मा सरस, सुलतानसिंह प्रेम, मदनमोहन सिद्ध री रचनावां लेय पाठकां साम्ही ऊभो हुयो।
अगस्त, १९७६ अंक रामचंद्र शर्मा व्याकुल, अम्बिकेश कुंतल, राधेश्याम जांगिड़, मोहब्बतसिंह राठौड़, कल्याणसिंह राजावत, प्रेमजी प्रेम, सवाईसिंह धमोरा, मदनमोहन सिद्ध, डॉ. उर्मिला देवी शर्मा री रचनावां स्वाधीनता अंक रै मिस ‘ईसरलाट` मांय छपी। अक्टूबर, १९७६ अंक नित्यानंद शर्मा, उषा त्रिवेदी, हरीश चौधरी, रामपाळी भाटी री रचनावां साथै हो। नवम्बर, १९७६ अंक मांय हरि की पटराणी तुलसी (श्रीमती रामपाली भाटी), पढ़ी लिखी बीनणी (डॉ. ललिता पारीक), भलो बच्यारवाळा (प्रेमजी प्रेम), हेलौ (रामनिरंजन शर्मा ठिमाऊ) आद रचनावां नै साम्ही राखी।
‘ईसरलाट` रै अगस्त, १९७६ अंक मांय संपादक बुद्धिप्रकाशजी आपरी बात हरेक राजस्थानी पत्रिका रै संपादक गत साम्ही राखी- ”उ यां कमाई का लोभ सैं तो या पतरी काढ़ी ही कोनै गई छी पण राजस्थानी का रोळा की हिमायत मैं ऊबी हुई ईसरलाट मैं जद खरचो ही खरचो हुयां जा रह्यो छै`र आंवद की कोड़ीका सैं आस ही नै री तो या सोचबा नै बेबस होणू पड़ रह्यो छै`क ईं पतरी नै आगै काढ़ी जाय`क कोनै।“
आ बात सैंग सूं खरी बात ही। आज जकी राजस्थानी पत्रिका चाल रैयी है बां रै साम्ही इज आ-ई दिक्‍कत है। कारण साफ है कै पत्रिका नै विग्यापन कोनी मिलै, ग्राहक कोनी बणै। और तो और राजस्थानी रा लिखारा ई ग्राहक नीं बणणो चावै। वै ईज आपरो अधिकार समझै कै पत्रिका उणां कनै लिखारै री हैसियत पांण मुफ्त मांय आवै। जे हरेक राजस्थानी लिखारो ओ नैम करलै कै म्हैं राजस्थानी पत्रिका रो सालीणो, आजीवन ग्राहक जरूर बणूलां तो पत्रिका नै भौत सा`रो लागै। आज राजस्थानी लिखारां री गिणत करां तो एक हजार सूं कमती को रैवै नीं। सौ रिपिया सालीणा एक रचनाकार सारू दो`रा कोनी। इण गत सगळा हुया एक लाख रिपिया सालीणा। कांईं ओ सा`रो नीं लगायो जा सकै पत्रिका नै? गाडै मांय एक लकड़ी रो कठै भारो?
सन् १९७६ रै अगस्त मांय पारीकजी लिखै- ”सरू की साल घूम फिर`र जैयां तैयां साढ़ी`क तीन सौ सदस्य बणाया छा……….. जद तांई एक हजार सदस्यां को चंदो अगाऊ न आ जाय जद तांईं ऊंनै सरकारी विज्ञापन कोनी मिल सकै। गई साल यो नेम च्यार सौ सदस्यां को छो…….।“
आं अबखायां कानी राजस्थानी पाठकां अर लिखारां नै सोचणो पड़सी। नीं तो जको मत्‍तो बानगी अंक मांय ‘ईसरलाट` रै संपादकीय पेटै संपादक बुद्धिप्रकाश पारीक प्रगटयो, बो कियां पार पड़सी- ”मैं ऊं दिन का दरसणां की उतावळो हो`र बाट न्हाळ रह्यो छूं`क जद लूणी, बांडी, माही, जवाई, चम्बल, बनास आद सारी नन्द्यां न्यारी-न्यारी नैं बै`र सबां की न्हैरां आपस मैं एकठी हो जाय अर राजस्थान नै हर्यो-भर्यो कर दे। ईं सुभ संस्कार मैं ढूंढ को पूरो-पूरो जोग देबा नैं ‘ईसरलाट` ऊबी हुई छै।“
राजस्थान री सतरंगी संस्कृति, मनमोवणी भासा अर जगचावा भावां नै आखै मानखै साम्ही एकठ राखणां है तो आपां नै चेतणो पड़सी। आपां घणां दिनां सूं आळसी बण्या पड़यां हां अर आपणै देखतां-देखतां न जाणै कित्‍ती ‘ईसरलाट` बंद हुयगी। कित्‍ता बुद्धिप्रकाशां रा जतन एक भांत अकारथ गया। एक छिण सोचो कै जे बुद्धिप्रकाशजी नै पाठकां री ग्राहकी रो सैयोग मिलतो तो आज ताणी ‘ईसरलाट` रा कित्‍ता अंक निसरता? आज ‘ईसरलाट` के रूप मांय होंवती?
पण आपां नै सोचण सारू बगत कठै?

सांच बात है। पण कीं हुवो भलां-ई बगत तो आपां नै ई काढणो पड़सी। मंगळकामनावां।

‘राट्रपूजा` रा तीन अंक : तीन सौ बरोबर

राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति री सालीणा पत्रिका ‘राष्‍ट्रपूजा` रतनगढ़ (चूरू) सूं सीताराम महर्षि रै संपादकत्व मांय निसरी। बरस १९७४ मांय इण रो पैलो अंक साम्ही आयो। इणरा कुल-मिलाय`र तीन सालीणा अंक निकळया। बरस १९७५ मांय दूजो अर १९७६ मांय तीजो। पत्रिका रा सलाहकार संपादक किशोर कल्पनाकांत अर सहकारी संपादक मुरली रांकावत, चंद्रप्रकाश सरल हा। संरक्षक मण्डल मांय हरिप्रसाद नेवटिया, पुरुषोत्‍तम अजितसरिया, श्यामसुंदर गोइन्का, श्यामसुंदर फतेहपुरिया, दिनेश अजितसरिया, विजयकुमार सरावगी अर बाबूलाल पंसारी भेळा हा। व्यवस्थापक रै रूप मांय गिरधारी महर्षि अर लीलाधर महर्षि ऊभा हा।
बरस १९७४ रै अंक मांय संपादकीय पेटै सीताराम महर्षि लिख्यो- ”राष्‍ट्रपूजा रो ओ वार्षिकी-रूप पैलो अंक आपरा हाथां मांय सूंपीज रैयो है। इणसूं पैली ‘राष्‍ट्रपूजा` पाक्षिक-समाचार-पत्र रै रूप मांय केई साल पैली छप्या करतो, पण कंई कारण सूं इणरै प्रकासण नै थाम दीन्यो गयो…… राजस्थानी रा तपोनिष्ठ-साधकां रै पुन्न-परताप सूं राजस्थानी रो भविष्य बण-संवर  रैयो है अर इण बणण-संवरण री प्रियोग नै बळ पुगावण री अबार घणी दरकार अनुभवीजै, जिको ‘राष्‍ट्रपूजा` नै वार्षिकी रूप छपावण री दरकार नै जाणीज सकै…….।“
समकालीन लेखन रै असवाड़ै-पसवाड़ै राज री नीतियां रै सारू संपादकीय (आरती रा बोल) मांय चिंता दीखावतां थकां लिखीज्यो- ”छळावां अर प्रळोभणां सूं तपोनिष्ठां नै ठगण रा राजकीय-प्रयास करीज्या है। धन अर पदां रा बगसावा करीजनै साधना नै खण्डित करण रा उपाव काढ़ीज रैया है। घणकरा भोळा अर अदूरदर्शी साहित्यकार इणरा सिकार भी बण्या है, बण रैया है। चंद-चोरटा जिकां रो काम राजस्थानी रै नांव उपरां राज नै ठगणै रो सदीव सूं रैयो है, बै इण सूं घणा राजी है, क्यूंक इणीज भांत बां रै ताबै आवण सकै! राजस्थानी रै खिलाफ एक लूंठो षड्यन्त्र रचीज्योड़ो है, जिणरै विरुद्ध एक एकलै मिनख रो मोरचो भी लाग्योड़ो है। इण भांत जागता-प्रयासां री दरकार ओळखीज सकै। ‘राष्‍ट्रपूजा` इणीज दरकार रो एक नैनो-अैनाणो है।“

आ` पत्रिका री सरूवात ही। पैलो अंक अर आक्रोश रा सुर।
कुल २३६ पानां रै इण अंक मांय रचनात्मकता री दीठ सूं घणी सामग्री भेळी ही। आवरण माथै साहित्य सिरजक अर राजस्थानी आंदोलन रा जोद्धा किशोर कल्पनाकांत रो मनमोवणो चितराम दीरीज्यो। अंक रै मांय उणां माथै सामग्री नीं दीरीजै, आ कियां हुय सकै ही! अंक मांय उणां माथै ‘आधुनिक राजस्थानी रा निर्माता : श्री किशोर कल्पनाकांत` (सीताराम महर्षि), ‘अखनकुंवार-तिसायो सिरजक : किशोर कल्पनाकांत` (कृष्णगोपाल शर्मा), अर ‘म्हारा मैमावान गुरुदेव :श्री किशोर कल्पनाकांत` (मुरली रांकावत)तीन आलेख हा।
ओळखांण पेटै संरक्षक श्यामसुंदर गोइन्का (सीताराम महर्षि) रो परिचै हो। निबंध ‘लुगाई री जूण (श्रीमती गायत्री अग्रवाल), ‘लुगाई मोटयार सूं कमती कोनी` (श्रीमती प्रभा गोयनका) अर रेखाचितराम ‘हेमी` (ओंकार पारीक) आपरी साख भरावै हा। कवितावां पेटै कळायण (सत्यनारायण प्रभाकर अमन), समदरसी, मन, तोल, फीटो मन, अणचींती (कन्हैयालाल सेठिया), मैं अर म्हारी कविता (पारस अरोड़ा), सिरै नांवों ढूंढ़ती कविता (श्रीमती आशा शर्मा), सांझ (रामनिवास शर्मा मयंक), दीठां अणदीठां (श्रीलाल नथमल जोशी) अर सूण (शांतिदेव शर्मा) रचनावां अंक री ओपमा बधावै ही तो कहाणीगत बुच्ची (रामप्रसाद चाकलाण), उळझ्योड़ा प्रश्नचिन्ह (सोमदेव शर्मा) अर चींचड़ (यादवेन्द्र शर्मा चंद्र) कहाण्यां जबरी ही। अंक मांय अमृता प्रीतम री पंजाबी कहाणी रो अनुवाद ‘छमक छल्लो`  (किशोर कल्पनाकांत) अर संस्मरण ‘ऊजळा अर काळा` (भगवती प्रसाद चौधरी शरद) भेळा हा।
राष्‍ट्रपूजा रै इण अंक री एक खास उपलब्धि ही कै संपूर्ण उपन्यास ‘लालड़ी एक फेरूं गमगी` (सीताराम महर्षि) दीरीज्यो। श्री महर्षि रो राजस्थानी साहित्य सारू ओ प्रयोग बडमजोग हो।

‘राष्‍ट्रपूजा` रो दूजो अंक सन् १९७५ रो हो। इण अंक रो आवरण ‘मरुवाणी` मासिक रा संपादक श्री रावत सारस्वत री छवि सूं दमकै हो। रामेश्वरदयाल श्रीमाली (रावत सारस्वत : जिका छापै पण छपै कोनी) मांयला पानां माथै रावतजी री ओळखांण करायी। संरक्षक बाबूलाल अग्रवाल रो परिचै ई अंक मांय हो। कवि कन्हैयालाल सेठिया (हल्दीघाटी), रामगोपाल नवल (मन बिणजारो), भागीरथसिंह भाग्य (गीत), सत्यनारायण प्रभाकर अमन (बादली, सुगन-साचा), वेदव्यास (चार जोड़), सीताराम महर्षि (दोय नैनी कवितावां), सत्यप्रकाश जोशी (सोवन-माछली), स्व. गणेशीलाल व्यास उस्ताद (अरे बुझागड़), कृष्णगोपाल शर्मा (कवि किशोर कल्पनाकांत री ४५ वीं बरसगांठ उपरां) अर नारायणसिंह भाटी (पासांण सुंदरी) री कवितावां रै साथै सीताराम महर्षि री चार कवितावां अर रामगोपाल जोशी री पांच नैनी कवितावां ईज अंक मांय भेळी ही।
गुजराती लिखारा कनैयालाल व्रजलाल वाघाणी री कहाणी ‘आलमपरा री आबरू` रो अनुवाद किशोर कल्पनाकांत कर`र ‘राष्‍ट्रपूजा` नै भेंट करयो। कृष्ण कल्पित ‘….सोई`, बैजनाथ पंवार ‘रूपाळी लूपां`, स्व. रामप्रसाद चाकलाण (भूतणी) अर जगदीशसिंह सिसोदिया स्नेही (माफी दे देवो) कहाण्यां रै मारफत आपरो योगदान दीन्हो। ललित निबंधां मांय उदयवीर शर्मा रो ‘बिसवास` अर विनोद सोमाणी हंस रो ‘सुगनां रो विचार` ‘राष्‍ट्रपूजा` रै इण अंक मांय हा। भगवतीप्रसाद चौधरी री एकांकी ‘सूर-हरि मिलण` आपरी अळगी पिछांण करावै ही।
लारलै अंक री गत पाळतां इण अंक मांय ईज सीताराम महर्षि रो उपन्यास ‘कुण समझै चंवरी रा कौल` दीरीज्यो। संपूर्ण उपन्यास पत्रिका मांय मिलणो पाठकां रो सौभाग्य हुवै। कुल १४८ पानां रो ओ` अंक एक जबरी पत्रिका री साख राखै हो।
‘राष्‍ट्रपूजा` रो १०० पानां रै तीजै अंक रो प्रकासण बरस १९७६ मांय हुयो। ओ अंक ‘लाडेसर` पत्रिका रै संपादक श्री रतन शाह री फोटू छप्यै आवरण साथै आयो। मांयला पानां माथै श्री शाह रो सांवठो परिचै हो। राजस्थानी-प्रचारिणी सभा री ओळखांण श्री रतन शाह खुद करवायी। ‘ओळखांण` थम्म मांय संरक्षक श्यामसुंदर फतेहपुरिया रो परिचै दीरीज्यो।
त्रिलोक गोयल (मुर्दाघर री ल्हाष), रामगोपाल नवल (जिद्द), कृष्णगोपाल शर्मा (सावळ देखल्यो, मैं मुजरिम आखर रो!), भागीरथसिंह भाग्य (संन्यासी), वेदव्यास (बांदरा रै हाथ मे गुलाब री छड़ी), कल्याणसिंह राजावत (दौड़ौ अर तौड़ौ), डॉ. मनोहर शर्मा (राष्‍ट्रकवि पृथ्वीराज राठौड़) अर कृष्ण कल्पित (अंधारै रो सूण) री काव्य रचनावां अर कहाण्यां पेटै सांवर दइया (धरती कद तांईं घूमैली), गोरधनसिंह शेखावत (इंतजार) अर सांवतराम चौधरी (करणी रौ फळ) री कहाण्यां ही। अंक मांय सूर्यशंकर पारीक रो ललित निबंध ‘मिनख अर मानखो` मूंडै बोलै हो।
अंक खातर सुखवीर री हिन्दी कहाणी ‘दुकान` रो डॉ. नृसिंह राजपुरोहित अर इटली रा कथाकार ग्रेजिया डेलेड्डा री कहाणी ‘जूत्यां` रो किशोर कल्पनाकांत उल्थो करयो। हुलासचंद बैद ‘कुदरत रै फुटरापै री राणी-मनाली` रो परिचै करायो। हंसी री गत मोहन आलोक ‘लीकड़ा` अर संतोष शर्मा ‘अब हांसण री बारी है` मांय पाळै। एकठ रचनागत इणबार सीताराम महर्षि री काव्य रचना ‘बोलै इकतारो` ही।
‘राष्‍ट्रपूजा` रै इण तीजै अंक मांय आगलै अंक (चौथै अंक) रो भरोसो हो। संपादकीय मांय सीतारामजी लिख्यो- ”आगलो अंक जनवरी ७७ में निकळसी। इण अंक मांय एक संपूर्ण उपन्यास अर दूजी रचनावां रै`सी…..।“
पण संपादक सीताराम महर्षि री बम्बई अर कलकता मांयली भागदौड़ भरी जिंदगाणी अैड़ी रैयी कै ओ सुपना पूरो नीं हुय सक्यो अर तीन अंकां रै साथै ई ‘राष्‍ट्रपूजा` बंद हुयगी।
तीन अंक हुयो भलांईं; अै तीन अंक आज रै तीन सौ अंकां री गत पाळै क्यूंकै उण बगत राजस्थानी सारू एक पत्रिकागत आंदोलन खड़यो करणो भौत जरूरी हो। सीताराम महर्षि उण जरूरत नै लगोलग तीन साल पूरी करी। एक मिनख इण सूं बेसी कांईं योगदान दे सकै हो?

श्री सीताराम महर्षि रै इण पत्रकारिता जोगदान नै राजस्थानी साहित्य सदीव निंवण करसी। राष्‍ट्रपूजा राजस्‍थानी साहित्‍य री धरोड़ रैयसी।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: